Tuesday, October 4, 2016

सैनिक Sainik - 2

वो सैनिक है आसमान सी छाती लेकर फिरता है,
धरती के हक़ में सुभाष की थाती लेकर फिरता है।

रातों के अधियारों में भी, उसकी नींद जगी रहती है,
अंधड़ रेत सहारों में भी, उसकी आँख खुली रहती है,
स्वप्नों के गलियारों में, उसकी बन्दूक तनी रहती है,
दर्रों मैदान पहाड़ों में, कर्तव्यज्योति जगी रहती है,
नमकीन न हो जाये मिट्टी, वो आँखें सूखी रखता है,
पढ़ने का वक्त नहीं मिलता, एक पाती लेकर फिरता है,
तपते रेगिस्तानों में जब, भू पर आग लगी रहती है,
फिर भी चलता है रक्षा का, दायित्व सँभाले फिरता है,

वो सैनिक है आसमान सी छाती लेकर फिरता है,
धरती के हक़ में सुभाष की थाती लेकर फिरता है।

--- नीरज द्विवेदी


Wo sainik hai aasman si
chhati lekar firta hai,
Dharti ke haq mein subhash ki
thati lekar firta hai.

Raton ke andhiyaron mein bhi,
uski neend jagi rahti hai,
Andhad ret sahaaron mein bhi,
uski aankh khuli rahti hai,

Swapnon ke galiyaron mein,
uski bandook tani rahti hai,
Darron maidan paharon mein,
Kartvy-jyoti jagi rahti hai,

Namkeen n ho jaaye mitti,
vo aankhein sukhi rakhta hai,
Padhne ka vakt nahin milta,
ik paati lekar firta hai,

Tapte registanon mein jab,
bhu par aag lagi rahti hai,
fir bhi chalta hai raksha ka,
daayitva sambhale firta hai,

Wo sainik hai aasman si
chhati lekar firta hai,
Dharti ke haq mein subhash ki
thati lekar firta hai.

--- Neeraj Dwivedi

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