Sunday, July 7, 2013

एक कोशिश शब्द पकाने की Ek Koshish Shabd Pakane Ki

कोई शब्द पकाता है,
पर पेट नहीं भरता,
कोई रोज हराता है अधिकार
नहीं करता …

मिट्टी की दुनिया में,
रोटी की चाहत से,
कोई रोज टूटता है आवाज
नहीं करता …

कैसा ये जमाना है,
खद्दर का कारीगर,
तस्वीर बनाता है पर रंग
नहीं भरता …

सत्ता की तवायफ ये,
गुमसुम भारत के,
पोस्टर छपवाता है निर्माण
नहीं करता …

आया चुनाव का मौसम,
वादों का बाजीगर,
नए ख्वाब सौंपता है साकार
नहीं करता ...

AC में सड़ने वाला,
हर देशभक्त नेता,
अपना हक तो जताता है पर प्यार
नहीं करता ...

आतंकवादियों को,
रिश्तेदार बनाता है,
कानून दामादों की ही क्यों जाँच
नहीं करता …

आहों से बुना हुआ,
रक्त सना है ये,
खद्दर खादी से केवल क्यों बना

नहीं करता ...
-- नीरज द्विवेदी Neeraj Dwivedi

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