Saturday, February 9, 2013

खुद को पाना जरूर Khud ko pana jarur

रूठती जा रही  है डगर  साथ चल,
बीतती जा  रही है उमर साथ चल,
ख्वाव जो भी बुने वो एक एक कर,
टूटते जा रहें  तू मगर  साथ चल।

उन्होंने किया  हम पे  एहसान जो,
बस हंस के दिया एक  फरमान वो,
किसी ने  कहा मुझसे  बड़ी जिंदगी,
चोट खाना जरूर पर मुस्का के चल।

कह सका वो नहीं जो भी कहने चला,
कर सका वो नहीं  जो मैं करने चला,
उठ गए जो कदम तो मैं चलता गया,
राहें कहने  लगीं अब मुझे छोड़ चल।

मंजिल ने बुलाना फिर भी छोड़ा नहीं,
स्वर्णिम सपने  दिखाना  छोड़ा नहीं,
डगमगाए  कदम तो मैं गिर ही पड़ा,
उठा भार फिर से, मेरे अरमान चल।

कुछ मिला न मिला एक जिद तो मिली,
कुछ पत्थर तो मिले मंज़िल न मिली,
चोटों ने  कहा  नीरज तुझे  है कसम,
खुद को पाना  जरूर तू इतरा के चल।

4 comments:

  1. बेहतरीन अभिवयक्ति.....

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  2. बहुत सुन्दर रचना
    http://voice-brijesh.blogspot.com

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  3. आपकी रचना निर्झर टाइम्स पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें http://nirjhar-times.blogspot.com और अपने सुझाव दें।

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