Sunday, January 20, 2013

मैं ढूंढ़ रहा था एक रुबाई Main Dhundh Raha Tha Ek Rubai


मैं  ढूंढ़  रहा  था  एक रुबाई,
मिली  मगर  वो  थी तन्हाई।

सपनों  के  पीछे   दौड़ा  था,
नींद  खुली जब  ठोकर खाई।

अंधेरों से  लड़ने की  जिद में,
हाथ जला  बुझ गयी  सलाई।

खुश  होकर  घर से  निकला,
भूख मगर  पड़ गयी  दिखाई।

सुलग उठेगा  उनका मन भी,
पेट की  आग न गयी बुझाई।

जिन्दा  लाशों सा  जीवन है,
इंसानों की  दुनिया  मुरझाई।

दामादों की  खातिरदारी  में,
लूट-लूट  कर  भरी  कमाई।

भूखे  गूंगों  की  चीखें  भी,
निकलीं  पर न गयी सुनाई।

इटालियन खद्दर की सोहबत से,
मर रहा देश है बिना रजाई।

चलता  रहा  सुकूँ  पाने को,
पैरों में  फट  गयी  बिबाई।

मैं ढूंढ़  रहा था  एक रुबाई,
मिली मगर  वो थी तन्हाई।

Featured Post

मैं खता हूँ Main Khata Hun

मैं खता हूँ रात भर होता रहा हूँ   इस क्षितिज पर इक सुहागन बन धरा उतरी जो आँगन तोड़कर तारों से इस पर मैं दुआ बोता रहा हूँ ...