Tuesday, January 31, 2012

हमने तो अपनी अकल लुटाई

Clicked by Neeraj Dwivedi
बीती रात बंदरिया बोली,
ये देश बना बंदर की खोली,
बनी मदारिन अपनी मैडम,
नाचे नचाबे जनता भोली।

सिरमौर बने मनमोहक ठाकुर,
चूँ न निकले बस पूंछ घूमावे,
जनता मूरख ठगी सी देखे,
ये पूरा देश गुलाम बनावे।

हम बकबक करते न अघावे,
हम तो अनपढ़ पूरे उल्लू,
कुछ न सुना देखा न बिल्कुल,
तुम कटत शाख पर सोवत उल्लू।

बड़ा तमाशा देखा जग ने,
मेरा घर फूँक ठहाके मारे,
रोटी छत को तरशे बचपन,
दिखते हैं दिन में अब तारे।

कसम खाई है अब भी अपनी,
आँख न हम खोलेंगे भाई,
जब तक हाथ में लिए कटोरा,
घूमन की नौबत न आए,
तब तक हम न जगेंगे भाई।
तब तक हम न जगेंगे भाई।।

Sunday, January 29, 2012

एक वाक्य


अगर कोई व्यक्ति आपको प्यार करता है,
आपकी चिंता करता है
और आप उसे स्वीकार नहीं करना चाहते,
उसका प्रतिदान नहीं करना चाहते
तो आप दुनिया के सबसे बड़े कायर, मूर्ख और एहसानफरामोश हैं।

एक आह



तब मैं तन्हा था खुश दिखता था,
आज मैं तन्हा हूँ खुश दिखता हूँ
पर तेरे बिना हे प्राण प्रिये तब भी,
खाली था और अब भी, खाली हूँ।

उस वक्त दहकती चाहों को मैंने,
अपने इस दिल में ही रोक लिया,
अब मुझसे ही डर का नाटक कर,
खंजर मेरे सीने में ही भोंक दिया।

Wednesday, January 25, 2012

अविभाज्य भारत की पुकार



धधकते घाव बंजर जमीन के,
शर्मों हया का पानी नदारद है,
मैं देख सोच जलता हूँ,
जर्रा जर्रा पिघलता हूँ,
मत होना विस्मित उस दिन,
जो दूर नहीं,
जब दुनिया का सिरमौर बना,
मैं हँसता हूँ।

मैं चन्द्रगुप्त का भारत हूँ,
भूगोल बदल सकता हूँ मैं,
अपंग आज़ादी के ५४ सालों का,
इतिहास पुनः लिख सकता हूँ मैं,
मत होना विस्मित उस दिन,
जो दूर नहीं,
जब पश्चिम को अपने चरणों पर झुका देख,
मैं हँसता हूँ।

सुखमय वक्त का बैठ,
इंतजार बस कायर करते हैं,
भ्रष्ट नेताओं का गुणगान,
उनके दास चारण करते हैं,
मत होना विस्मित उस दिन,
जो दूर नहीं,
जब लेखनी से लिखा गया एक एक शब्द,
सच का पर्याय बना ब्रह्मांडमय बन,
मैं हँसता हूँ।

कह देना सीमा पार पड़ोसी से,
उनसे भी,
जो मुझको अपनी बना बपौती,
भारत के मालिक होने का,
स्वांग भरा करते हैं,
मृत नहीं हुयी अभी भी मिट्टी,
जीवित है तेज प्रखर स्वाभिमान का,
नव सृजन का हुंकार करूंगा जिस पल,
पूरी धरा करवटें बदलेगी,
बदलेगा भूगोल साथ ही,
फिर से गौरवमय इतिहास बनेगा इसका,
मत होना विस्मित उस दिन,
जो दूर नहीं,
जब विश्व खड़ा सलामी दे,
और फिर से अविभाज्य भारत बन,
मैं हँसता हूँ।



Tuesday, January 17, 2012

बलराम हमें बनना होगा



उन देशभक्त मतवालों का, कुछ एक सुनहरी शामों का,
कब तक करेगा अपना भारत, इन्तजार घनश्यामों का

कहाँ सो गयी जलने वाली, स्वाभिमान की आग प्रखर,
कहाँ खो गयी कवियों की, प्रेरणादायक आवाज मुखर...

कहाँ व्यस्त चाणक्य गुरु, न जन्मा फिर एक चन्द्रगुप्त,
या बंजर हो गयी देव भूमि ये, हुआ तेज ये कहाँ बिलुप्त...

वो श्याम नहीं आयेगा अब, बलराम हमें बनना होगा,
इस अपनी माँ की रक्षा का तो, भार वहन करना होगा

करना होगा अब स्वदेश का, जीवित फिर से तेज प्रबल,
इस भ्रष्ट निरंकुश सत्ता का, अब करना होगा अंत सबल...

भारत को अपने भुजदंडों का, जोर पुनः अजमाना होगा,
अपने भारत की प्रभुसत्ता को, पुनः आदर्श बनाना होगा

इस भारत माँ की महिमा को, फिर से मंडित करना होगा
उठ नवसपूत भारत के इसको, पुनः अखंडित करना होगा...
इसको पुनः अखंडित करना होगा.

Thursday, January 12, 2012

मिल जाओ प्रिये


इतना न मुझको सताओ प्रिये,
इतना न तुम याद आओ प्रिये,
इक डोर पतली जोड़े है हमको,
इक आस छोटी जीवित है अब तो,
इक बुझी साँस है मिल जाओ प्रिये,
या इसको भी यूँ ही मिटाओ प्रिये।

इतना न मुझको सताओ प्रिये,
इतना न तुम याद आओ प्रिये,
इस दीप की धैर्य बाती है छोटी,
घी भी है कम सा और थोडा खोटी,
अब बढ़ने को है, मिल जाओ प्रिये,
या इसको भी यूँ ही बुझाओ प्रिये।

Tuesday, January 10, 2012

इक सूखे खेत की धान



इक सूखे बंजर खेत में,
हमको है बोनी धान,
निरंकुश शासक,
चोर अनुशासक,
क्षुधित भवितव्य,
पशुता भव्य,
इस अपने निर्जीव देश में,
हमको है बोनी जान
इक सूखे बंजर खेत में,
हमको है बोनी धान

तलाश: अभिमानी रक्त की तलाश



तलाश
फिर रहा हूँ दर दर बेशक
आवारा नहीं हूँ,
जल रहा हूँ भीतर बेहद,
अंगारा नहीं हूँ,
एक लौ जला रखी है रग रग में,
फिरता हूँ बंजारा 
इस गौरवमयी देश के
अभिमानी रक्त की तलाश में.... 

Sunday, January 8, 2012

जानवर सा शरीर



पौष के महीने में,
बर्फीली कड़कती ठंड में,
तेज ठिठुराती हवा में,
एक जानवर सा शरीर,
कोई चीथड़ा लपेटे हुये....

नफरत की आग में,
भ्रष्ट नेतृत्व के संताप में,
सुप्त यौवन के वियोग में,
एक झुलसता महान देश,
गौरवमयी इतिहास लिए....

Wednesday, January 4, 2012

आम आदमी Common Man


एक वक्त, चलता हुआ,
एक रात, जगती हुई,
एक दिन सोता हुआ,
देश का भाग्य देखो,
वक्त के साथ करवटें लेता हुआ ..।
आम आदमी रोता हुआ

मिट रही है धुंध,
एक दो जागते से लोग,
नपुंसकों को सौंप सत्ता,
पूरा देश देखो बेधड़क,
न जाने कितने वक्त से सोता हुआ ..।
आम आदमी रोता हुआ

मैली कुचली हुई ओस,
मरता हुआ आँख का पानी,
देश की कायर बेशर्म जवानी,
कितनी काली रातों से
बहता देश का शोणित पानी होता हुआ ..।
आम आदमी रोता हुआ

Monday, January 2, 2012

तलाश: वक्त की तलाश


तलाश
वक्त की तलाश,
उमड़ते घुमड़ते सजल बादलों के संग,
चहुँ ओर बिखरा उज्जवल भगवा रंग,
भानु की अनुपम छटा बिखरी गगन में,
या नवक्रांति की पताका फहरती पवन में,
दूर से अविराम आती पाँञ्चजन्य ध्वनि,
अधूरी नींद से जगकर तत्पर कर्ममुनि,
मैं आज निकला हूँ किसी की तलाश में,
काश मिल जाये फिर से कोई क्रांतिवीर,
भविष्य के स्वर्णिम वक्त के लिबास में
मैं आज फिर निकला हूँ

Sunday, January 1, 2012

अस्तित्व एक बूंद का: स्वेद

स्वेद क्या है?
एक खारी बूँद, जल की
एक आर्द आह, पवन की
एक शांत वेवेचना, श्रम की

स्वेद क्या है?
एक सुखद पुकार, तन की
एक शीतल हार, ऊष्म की
एक दृष्टा, श्रमिक लगन की
एक झलक, आतुर व्यथित जन की

स्वेद एक, रंग एक, स्वाद एक
और एक मूर्ति, संजोये श्रम अनेक
मौन भाषा और व्याकरण के
संग प्रस्तुत कथा तन की

स्वेद क्या है? ये है स्वेद का अस्तित्व

यदि स्वेद न हों?
यदि हो जायें स्वेद अस्तित्वहीन?

ऊष्मा घुल जाये, तन में
मौन हो जाये श्रम, श्रमिक में
जिव्हा कब तक गवाही दे, यदि
दिखे न एक भी श्रमित बूँद तन पे

यदि फिर भी जीवित रहें वर्जनाएं मालिकों की
तो क्या हो जाये श्रमिक मृतप्राय
श्रम करते करते,
तोड़ दे बर्जनाएं शरीरों की
भावहीन मालिकों को
खुश करते करते

तब कैसे होगी शीतल देह अकल्पित
श्रम धारण करते करते
तब कैसे खाली होगा मेघ अकल्पित
जल भीतर रखते रखते
यदि हो जायें स्वेद अस्तित्वहीन?

Featured Post

मैं खता हूँ Main Khata Hun

मैं खता हूँ रात भर होता रहा हूँ   इस क्षितिज पर इक सुहागन बन धरा उतरी जो आँगन तोड़कर तारों से इस पर मैं दुआ बोता रहा हूँ ...