Saturday, June 30, 2012

राहों के पत्थर Rahon ke Patthar


बूँद बना जीवन चंचल है, कैद सीप में मोती तन्हा।
बस बादल जीवित होता है, सीप भला जिंदा होती है?

जिसका स्वप्न न हो उड़ने का,
जिसको चाव न हो लड़ने का,
जिसके पैरों में जंग लगी हो,
जिसको शौक बड़ा डरने का,
नदियाँ ठहर जाएँ राहों में, क्या अंतर होगा पोखर से?
गति मे ही जीवन जीवन है, सीप भला जिंदा होती है?

जो गिरा नहीं ठोकर खाकर,
उसने सीखा तो क्या सीखा?
दर्द न हो जिसके जीवन में,
बस हँस पाया तो क्या पाया?
समझ न पाया दर्द पराया, मानव तो वो मानव कैसा?
मिट जाए तपकर जीवन है, सीप भला जिंदा होती है?

जिसकी राहों में कांटे न हो,
उसने राहों से क्या पाया?
मंजिल सबकी एक रही है,
कौन यहाँ जीवित बच पाया?
मज़ा लिया नहीं चोटों का, उसने जीवन क्या जी पाया?
राहों के पत्थर मंजिल हैं, मौत भला मंजिल होती है?

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