Saturday, June 30, 2012

राहों के पत्थर Rahon ke Patthar


बूँद बना जीवन चंचल है, कैद सीप में मोती तन्हा।
बस बादल जीवित होता है, सीप भला जिंदा होती है?

जिसका स्वप्न न हो उड़ने का,
जिसको चाव न हो लड़ने का,
जिसके पैरों में जंग लगी हो,
जिसको शौक बड़ा डरने का,
नदियाँ ठहर जाएँ राहों में, क्या अंतर होगा पोखर से?
गति मे ही जीवन जीवन है, सीप भला जिंदा होती है?

जो गिरा नहीं ठोकर खाकर,
उसने सीखा तो क्या सीखा?
दर्द न हो जिसके जीवन में,
बस हँस पाया तो क्या पाया?
समझ न पाया दर्द पराया, मानव तो वो मानव कैसा?
मिट जाए तपकर जीवन है, सीप भला जिंदा होती है?

जिसकी राहों में कांटे न हो,
उसने राहों से क्या पाया?
मंजिल सबकी एक रही है,
कौन यहाँ जीवित बच पाया?
मज़ा लिया नहीं चोटों का, उसने जीवन क्या जी पाया?
राहों के पत्थर मंजिल हैं, मौत भला मंजिल होती है?

4 comments:

  1. सुंदर रचना के लिए आपको बधाई

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  2. jiski raahon main kaantae na ho, usne sahi manzil ko kahan paya...bhi ho sakta hai...brother....maza nahin liya jisne choton ka, usne jeewan ka ras kya paya...bahut khoob...jeewan ki paribhasha achchi di hai ....

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  3. रामी दी .. यहाँ मेरा मतलब है कि जिसकी राहों में काटें ना हों भले ही उसने मंजिल पा ली हों पर जो राहों से, राहों में उसे सीखना था वो नहीं सीख पाया. काँटों के बिना उसे जीवन में सीखने को कुछ नहीं मिला. आपकी बात भी सही है कि उसने सही अर्थों में मंजिल नहीं पाई?

    आभार संजय जी आशीर्वाद देने के लिए

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  4. दीप्ति मित्तलJuly 4, 2012 at 2:41 PM

    बहुत ही अच्छी और गहरी रचना है। मेरे गुरू सरश्री भी यही कहते हैं, समस्या या परेशानी हमें कुछ सिखाने और हमारा विकास करने ही आती हैं। और यही हमारे बंधनों और समस्याओं से घिरे मानव जीवन का एकमात्र उद्देश्य है-आत्मा का विकास।

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प्रशंसा नहीं आलोचना अपेक्षित है --

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