Monday, May 21, 2012

धुंधला सा अंतर Dhundhla sa Antar


धुंधली गत और  आँसू धुंधले,
धुंधली चाहत के सपने धुंधले,

धुंधले मौसम के किस्से धुंधले,
सबके जागीरों में हिस्से धुंधले,
सच आखिर  क्यों  रहता टूटा,
क्यों है  रिश्तों से  नाता झूंठा?
क्यों  दुनिया का रंग बेरंग है?
सबके  हिस्से ही क्यों गम है?
सबको आखिर  मे मिट जाना,
क्यों उगने को उत्सुक अंकुर है?

शबनम   बूंदे  आँसू   ओले,
सबको  मोती क्यों  कहते हैं?
रंग  जरा   मटमैला  सा है,
स्वेद ही  सस्ते क्यों रहते हैं?
धुंधला जीवन  दुनिया धुंधली,
धुंधली राहों की मंजिल धुंधली
धुंधला सा ही  क्यों अंतर है,
इसके सच और उसके सच में?

6 comments:

  1. आमंत्रित सादर करे, मित्रों चर्चा मंच |

    करे निवेदन आपसे, समय दीजिये रंच ||

    --

    बुधवारीय चर्चा मंच |

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  2. वाह ..बहुत ही बढि़या प्रस्‍तुति।

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  3. आप ने आकर बुधवारीय चर्चा मंच की शोभा बधाई ।

    आभार ।।

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  4. धुंधला सा ही क्यों अंतर है,
    इसके सच और उसके सच में?

    सुंदर

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  5. I feel that the apparent pessimism in your lines is not what you mean. May be it is an expression of your realisation of reality of this world that is so different from what we were told in our childhood. Life is beautiful anyway with 'injustice' having a share in it.

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  6. Yes Nawab Ji, you are quite right. Life is beautiful.
    That is why I have written few lines like:

    रेत सी है जिंदगी
    फिसलती जा रही है
    मीठी है पर
    कुल्फी पिघलती जा रही है।

    जो यहाँ मैंने लिखा वो केवल एक पहलू है जीवन का और कुछ नहीं।
    आभार आपका, आपके विचार हमेशा आमंत्रित है यहाँ पर।

    ReplyDelete

प्रशंसा नहीं आलोचना अपेक्षित है --

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