Monday, May 7, 2012

अव्यक्त


मेरे स्वप्न,
जिंदा होने से,
डरते हैं,
मेरे शब्द,
पन्नों में आहें,
बुनते हैं,
मेरे भाव,
खुद में ही,
घुट मर जाना चाहते हैं,
जानते हो क्यों?
.....क्योंकि मैं,
बेहद उदास हूँ,
हाँ निराश हूँ,
कहता हूँ निराशा की बातें,
क्या करूँ अब,
सच कहना छोड़ दूँ,
एक मुखौटा ओढ़ लूँ,
आँखों पर पट्टी बांध लूँ,
या बेहतर है,
बहरा भी जाऊँ,
कैसे अनसुना कर दूँ,
निरीह चीत्कारों को?
कैसे अनदेखा कर दूँ,
चरित्र के बीमारों को?
क्या केवल इसलिए,
इसे अनसुना अनदेखा कर दूँ,
कि ये सब मेरे ऊपर नहीं बीता है?
इंतजार करूँ,
अपने ऊपर बीतने का,
अपने घर की इज्जत के,
चीथड़े उड़ने का,
और कौन ये नियत करेगा,
कि अब मुझे चोट लगी है,
क्या गूंगे निरीह मानव की भावनाएँ,
अव्यक्त ही रहने दूँ?
बिके कलम के ठेकेदारों की,
भांति इस कलम को भी,
सिर्फ अपने लिए जीने दूँ?
कैसे रोक लूँ खुद को,
अपने ही अंतर की आग में जलने से?
कैसे कायरता की ओढनी ओढ़ कर,
नपुंसक होने का ढोंग करता रहूँ?
आखिर कैसे?

3 comments:

  1. sach me kaise andekha kar du charitr ke beemaro ko ....bahut mushkil haiis tereh ke jo bhi log sampark me aate hai unhe andekha karna

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  2. सशक्त और प्रभावशाली रचना.....

    ReplyDelete

प्रशंसा नहीं आलोचना अपेक्षित है --

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