Thursday, February 23, 2012

न्यायालय की बिक्री

Indian Supreme Court, Image from Google with thanks
मेरे गाँव की साँझ बाली, छप्पन काका की चौपाल रोज की तरह लगी हुई थी. देश और समाज के हालातों पर चर्चा तो अक्सर होती ही रहती थी. सब कुछ भ्रष्ट होते हुए भी सबका विश्वास न्यायालयों पर थोडा बहुत तो जिन्दा ही था. यही सब इधर उधर की चर्चा के बीच सबने देखा रामू तेज क़दमों से कुछ बडबडाता बढ़ा आ रहा है. 

आते ही बोला काका खबर पक्की है भरोसा न हो तो कल के अख़बारों में पढ़ लेना, छप्पन काका बोले, बता तो सही खबर क्या है ..... "अरे काका अभी तक कुछ चपरासी बिके थे, कुछ सरकारी अफसर बिके थे, कुछ वकील बिके थे, कुछ न्यायाधीश बिके थे और इस देश के कुछ नेता बिके थे आज तो पूरा न्यायालय ही बिक गया". "अब या तो यहाँ बैठ बातें बनाना छोड़ो और अपना एक एक लड़का देश पर निछावर करो नहीं तो झोला झंडा उठाओ और चलते बनो अब इन मरे जमीर वालों ने हम सबको भी बेचने की ठान ली है"

बिकने की   जल्दी में देखो,
देश ये पूरा    लगा हुआ है,
न्यायालय  पीछे क्यों रहता,
जो खादी खाकी बिका हुआ है.

पहले बिका   तराजू उसका,
फिर कपडे की  पट्टी काली,
अब देखो लो बिका देश भी,
न्याय सहित हर एक सवाली.

उठो उठाओ  अब तो जागो,
या सोते सोते बिक जाओगे,
लगता है अब समय आ गया,
तुम फिर गुलाम हो जाओगे.


Featured Post

मैं खता हूँ Main Khata Hun

मैं खता हूँ रात भर होता रहा हूँ   इस क्षितिज पर इक सुहागन बन धरा उतरी जो आँगन तोड़कर तारों से इस पर मैं दुआ बोता रहा हूँ ...