Saturday, February 11, 2012

चूल्हा फूंकता बचपन


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कलम विवश क्या-2 लिख जाए?
शब्द  नहीं  मिलते  भावों  को,
समय  बेचारा  बैद्य  चतुर  है,
कहीं लेप न लग जाए घावों को।

झूठी  इज्जत का बना  पुलिंदा,
कुर्सी पर  जमा हुया है पचपन,
पर असली भारत के हर घर में,
अब भी चूल्हा फूँक रहा है बचपन।

तुम किस इज्जत के रखवारे हो?
किस  धर्म  जाति के मारे हो?
तुम कहाँ  ढूंढते हो ईश्वर को?
जब वो भूखा सड़क किनारे हो।

उस  दिनकर की रचनायों सा,
वो ओज कहाँ अब लुप्त हुया?
सच को अनदेखा करने वालों,
क्या शोणित तेरा सुप्त हुया?

कैसे सो जाते हो इन रातों में?
बस  अंधे  बहरे  कंबल  ओढ़े,
मूक जवानी पर रोते भारत की,
ये काली  रात न  हमको छोड़े।

पर  हम  कैसे सो  जाएँ माँ?
बिन  अपनी  भेंट  चढ़ाये माँ?
इन  भावों  का  टूटा  गट्ठर,
शायद  तेरे  मन को भाए माँ।

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