Friday, February 10, 2012

गहन उदासी है शब्दों में


Image from google, Bharat counting teeth of lion

गहन उदासी है  शब्दों में,
भरी  आग  है  भावों में,
बस चलता हो तो हम भी,
अब देश चलाएं ख्वाबों में।
गहन उदासी है  शब्दों में।

सुप्तप्राय  जनमानस  और,
देख  राष्ट्र  की  हालत ये,
शांति शोभती है उस घर में,
न्याय बसा हो जन जन में।

भरे स्वप्न हैं अंतर में अब,
पर काव्य  नहीं गा पाता है,
वीर  भोग्या   बसुंधरा  के,
अपराधी  भाग्यविधाता  हैं।

हम कायर  हैं डरते हैं अब,
बस अपनी क्षुधा मिटाते हैं,
कलम भूलती है पथ अपना,
बस  सम्मेलन  में गाते हैं।

रोज  शायरी  करने से ये,
देश  नहीं  जागा  करता,
मिल जाएगी थोड़ी इज्जत,
खुश हो लुटती अस्मत में?

किन्हे जगाएँ हम सोने से?
जो बज न सकी है रणभेरी,
कुंभकरण से सुप्त लोग हैं,
श्रृंगार में व्यस्त कलमधारी।

ऐसे  बिषयों का चयन नहीं,
क्यों होता है किसी शाला में,
देश धर्म को जरूरत जिसकी,
पड़े  क्रांति  की  ज्वाला में।

करते हैं विकसित खुद को,
गर्व  सहित कार्य शाला में,
गिरा जा रहा  देश गर्त में,
हम कविता की मधुशाला में।

बड़े  पुजारी  बने  शांति के,
अपनी कायरता के गुण गाते,
भूल  गए ये था उनका हक,
जो थे सिंह से खेला  करते।

सभी व्यस्त रहें प्रेमी मिलन में,
पर हम वो  धर्म निभाएँगे,
कदम साथ होगा धरती के,
नित शब्दों की भेंट चढ़ाएँगे।

हम बस गीत ये  गायेंगे,
धरा पे बलि बलि जायेंगे।

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