Saturday, February 4, 2012

तटस्थ होना: एक अपराध


अन्याय का साथ देना अपराध है परन्तु तटस्थ रहना आज उससे भी बड़ा अपराध है। 

कल वो रो रहे थे,
वेवक्त के थपेड़े, सह रहे थे।
बेवजह बेआबरू हो रहे थे।
और हम,
तटस्थ खड़े उन पर हँस रहे थे।

आज हम लुट रहे हैं,
निर्दय वक्त के हाथों, पिट रहे हैं।
आपस में ही मर कट रहे हैं।
और वो,
तटस्थ खड़े हम पर हँस रहे हैं।

वाह रे तटस्थ मानव और
तेरी बुद्धिहीन तटस्थता को
कलियुग का प्रणाम ...। 

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