Wednesday, January 25, 2012

अविभाज्य भारत की पुकार



धधकते घाव बंजर जमीन के,
शर्मों हया का पानी नदारद है,
मैं देख सोच जलता हूँ,
जर्रा जर्रा पिघलता हूँ,
मत होना विस्मित उस दिन,
जो दूर नहीं,
जब दुनिया का सिरमौर बना,
मैं हँसता हूँ।

मैं चन्द्रगुप्त का भारत हूँ,
भूगोल बदल सकता हूँ मैं,
अपंग आज़ादी के ५४ सालों का,
इतिहास पुनः लिख सकता हूँ मैं,
मत होना विस्मित उस दिन,
जो दूर नहीं,
जब पश्चिम को अपने चरणों पर झुका देख,
मैं हँसता हूँ।

सुखमय वक्त का बैठ,
इंतजार बस कायर करते हैं,
भ्रष्ट नेताओं का गुणगान,
उनके दास चारण करते हैं,
मत होना विस्मित उस दिन,
जो दूर नहीं,
जब लेखनी से लिखा गया एक एक शब्द,
सच का पर्याय बना ब्रह्मांडमय बन,
मैं हँसता हूँ।

कह देना सीमा पार पड़ोसी से,
उनसे भी,
जो मुझको अपनी बना बपौती,
भारत के मालिक होने का,
स्वांग भरा करते हैं,
मृत नहीं हुयी अभी भी मिट्टी,
जीवित है तेज प्रखर स्वाभिमान का,
नव सृजन का हुंकार करूंगा जिस पल,
पूरी धरा करवटें बदलेगी,
बदलेगा भूगोल साथ ही,
फिर से गौरवमय इतिहास बनेगा इसका,
मत होना विस्मित उस दिन,
जो दूर नहीं,
जब विश्व खड़ा सलामी दे,
और फिर से अविभाज्य भारत बन,
मैं हँसता हूँ।



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