Saturday, November 26, 2011

जिद्दी हैं खुद को अब तक बदला नहीं है



ये इश्क है मेरा कोई तमाशा नहीं है,
दर्द है मेरा पानी का बताशा नहीं है

वक्त की तपिश का अंजाम मालूम है,
मेरे प्यार का अब ये जनाजा नहीं है

मालूम है गहराइयाँ उनके भी हद की,
अब खुद को डुबोने का कायदा नहीं है

बह चले जो लहरों में मिलते हैं अक्सर,
अब मेरा उनसे मिलने का इरादा नहीं है

दर्द और नफरत की हद से हूँ वाकिफ,
ये दोनों मिले हैं मुझे मैंने खरीदा नहीं है

लाख कमियाँ दिखें ज़माने को हम में,
जिद्दी हैं खुद को अब तक बदला नहीं है

Tuesday, November 22, 2011

कुदरत



कुदरत ईमान है, अंजाम है मोहब्बत का,
वक्त की पहचान है नतीजा है इबादत का

अरे इंसान शुक्र है खुदा ने ये कुदरत बनाई है,
जाकर ऐश कर जब तक इसकी रहनुमाई है

इन्साफ के दरख्तों को भूल मदहोश मत हो,
यदि अंत हो इसका तो तू है बस तेरी तन्हाई है

Thursday, November 17, 2011

बस उसकी ही अंगड़ाई में



इन सर्द अँधेरी रातों में, रुक रुक होती बरसातों में।
वो दीप आस का लगता था, तेरी उन भोली बातों में॥

साथ चले दो कदमों में, सिहरन होती थी रग रग में।
दूरी थी बहुत जरा सी पर, मन उड़ता था बस मीलों में॥

इस सागर की गहराई सी, तेरे मन की चतुराई में।
सत्प्रेम अंकुरित मन मेरा, विकसित होता तरुणाई में॥

छल छल करती नदिया या, गंभीर जलधि का अंतरतम।
जीवन की अविरल गंगा थी या था सावन का चंचलपन?

मन की सारी गुपचुप बातें, होती उनसे चतुराई में,
सब कुछ कह डाला हमने, हम रिक्त हुये तन्हाई में॥

हम निपट अकेले रहते हैं, अनचाही विवश जुदाई में।
वक्त लगे ठहरा रहता है, बस उसकी ही अंगड़ाई में॥

अब किससे और कैसे बोलें, जब कोई साथ नहीं देता।
हमको बस लिखना पड़ता है, इस सुंदर रीती तन्हाई में॥

काश हम भी



काश तेरे जीवन में हम भी,
खुशियों का एक ठिकाना होते।
होते तेरे राजदार हम, तेरे
सपनों का एक फसाना होते॥

काश तेरे जीवन में हम भी,
हँसने का एक बहाना होते।
होते हर पल याद तुम्हें हम,
तेरे आँसू का एक ठिकाना होते॥

काश तेरी आँखों में हम ही,
बस एक उगते सितारे होते।
होते सब कुछ तेरे हम ही,
और मेरे जीवन, तुम होते॥

काश तेरे जीवन में हम भी,
बस एक पूरा जमाना होते।

कब तक तुम भी



एक सुबह की धड़कन बोली,
कब तक प्रश्न करोगे तुम भी?
हमने सब कुछ कह डाला है,
हमने सब कुछ लिख डाला है,
कब तक अनजान बनोगे तुम भी?

उत्तर सारे सम्मुख रहते हैं,
लोग उन्हें अनदेखा करते हैं,
ज्ञान स्वयं में पूर्ण रहा है,
बालक भी सम्पूर्ण रहा है,
असीम प्रकृति के नियमों का,
कब तक अपमान करोगे तुम भी?

कब तक प्रकृति तुम्हे दुलराएगी?
जीवन के सच्चे अर्थ बताएगी?
कब तक यूँ क्षमा करेगी तुमको?
बचा धर्म एक बस मानवता है,
कब तक बदनाम करोगे तुम भी?

Wednesday, November 16, 2011

ये कौन सा देश है

Image From http://bellydanceduventre.com

ये सोने की चिड़िया भारत था,
अब देश बना कंगालों का है।
चन्द्रगुप्त का अद्भुत भारत,
अब देश बना गद्दारों का है॥

नेतृत्व नैतिकता भूल चुका है,
जनता मूर्ख बनी बस सोती है।
अपने अधिकारों को आश्वासन के,
चरणामृत में घोलकर पीते हैं॥

उन पर लिखने की कोशिश क्यों हो?
क्यों हो उन पर लेखनी व्यस्त?
जो सोते महलों में लूटें भारत,
मानवता त्याग बने हैं धनपरस्त॥

ये कलम चलेगी अब जी भर कर,
दीनों हीनों के घावों से रिसकर।
अब बरसेगी उनकी भावना प्रखर,
माँ सरस्वती के रूपों में सजकर॥

Friday, November 11, 2011

चेहरे बदल रहे हैं

Image from funnnygalary.blogspot.com

बदल रहे हैं शायद लोगों के चेहरे बदल रहे हैं,
गिरगिट के रंगो संग उनके मोहरे बदल रहे हैं।

कभी प्यार इतना होता है कि दुनिया जोड़ रहे हैं,
कभी किसी बात पर रूठे तो रिश्ते तोड़ रहे हैं।

न जाने किन शर्तों पर जीने की कोशिश करते हैं,
इन्सानो को ऐसे बदलें जैसे कपड़े बदल रहे हैं।

पता नहीं किस लायक हूँ जो मुझको झेल रहे हैं,
अन्दर नफरत भरी है पर हँस कर बोल रहे हैं।

बदल रहे हैं शायद लोगों के चेहरे बदल रहे हैं,
गिरगिट के रंगो संग उनके मोहरे बदल रहे हैं।

Thursday, November 10, 2011

मेरी आवाज Meri Awaj


मैं खोना नहीं चाहता अपनी आवाज,
एहसानों के नीचे क्यूँ दबाते हो मुझे?

सिद्दत से बेहद चाहा है हमने तुमको,
खुद ही कमजोर क्यूँ बनाते हो मुझे?

हमें पता है तुमने भुला दिया है हमें,
अब खुद याद आ क्यूँ सताते हो मुझे?

वक्त के थपेड़ों ने बहुत सितम ढाएँ है,
हालचाल पूछ झूठे मरहम क्यूँ लगाते हो मुझे?

अकेले चल सकता हूँ पता है मुझे, अब
दो कदम की लाठी बन बूढ़ा क्यूँ बनाते हो मुझे?

मैं खोना नहीं चाहता अपनी आवाज,
एहसानों के नीचे क्यूँ दबाते हो मुझे?

Wednesday, November 9, 2011

जीवन धारा



अविरल चलती करती छल छल,
रखती सुख दुःख जीवन धारा।
स्वयं अकिंचन, भरती कण कण,
गति निर्मोही ये जीवन धारा॥

जलधारा की गति सागर अर्पित,
जीवन धारा मृत्यु समर्पित।
सतत समय के रथ पर चढ़,
पल में हँसती रोती जीवन धारा॥

सत्य समय के असीम पट पर,
जीवन चित्रित करती पल पल।
मानव के अनगिन रूपों का,
अद्भुत वर्णन करती जीवन धारा॥

शब्दार्थ:
अविरल = बिना रुके
अकिंचन = कुछ भी नहीं (nothing)
निर्मोही = माया मोह रहित
सतत = लगातार
असीम = सीमा रहित (Unlimited)

Tuesday, November 8, 2011

दैवीय रूप


नयन भटके, नयन अटके,
देख एक सुंदर स्वरूप।
चित उछल उछल करता हलचल,
सम्मुख है अभिराम रूप॥

अद्भुत सुंदर विकसित तन,
लज्जित अरु चंचल चितवन।
उज्ज्वल धवल वस्त्र शुशोभित,
बस लगे कोई दैवीय रूप॥

मैं ठहरा एक पुजारी उसका,
पूजन करता छांव धूप।
गिने चुने चंचल कदमों से,
सम्मोहित करता रंग रूप॥

मदभरे नयन पूर्ण यौवन,
आकर्षित करते प्रत्येक मन।
सुरचित त्रुटिहीन सत्य सौंदर्य,
स्वयं प्रदर्शित मूर्ति रूप॥


शब्दार्थ:
अभिराम = सुंदर
धवल = सफ़ेद

Sunday, November 6, 2011

सूरज का एकाकीपन



एकाकी मानव का अस्तित्व प्रदर्शित,
ये सूरज का एकाकीपन है,
अभी मद्धिम है आभा इसकी,
या प्रखर तेज का सीधापन है?

सतत प्रगति का है ध्वजवाहक,
या है समय का अनुसंधान,
ये सूरज का आवारापन है,
या मानव जीवन का बंजारापन?

ये जीवन के अरुण क्षितिज पर,
सतत निखरता बालकपन है,
उड़ उड़ कलरव करते पंछी,
और बिहंसती प्रकृति साथ है,

खेल खेल में बढ़ते बालक,
की भांति सूर्य का चढ़ जाना है,
ये विकसित होता मानव मन है,
या सुन्दर होता अम्बर तन है?

Wednesday, November 2, 2011

एक साधक


आज कोई साधक है मगन,
शायद बन रही है एक धुन।

खुद में मस्त है, अनजान है,
रचता काव्य का अभियान है,
मेरा झट से जा पहुँचा है मन,
उसके साथ है अविचल लगन॥

साथ ही दिखता बडा सानन्द है,
शायद सृष्टि का आनन्द है,
स्थान सुन्दर पर है निर्जन,
न जाने हो रहा है किसका वर्णन?

चाहता है शान्ति का सन्देश देना,
या नयी क्रान्ति का उद्घोष करना,
प्रेम से कविता का करता सृजन,
काव्य का सृंगार करता शान्त मन॥

आज कोई साधक है मगन,
शायद बन रही है एक धुन।

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