Thursday, September 29, 2011

ऐसी भी है क्या मजबूरी


मैंने एक विराम लिया क्या,
तुमने कर ली मीलों की दूरी,
कई दिन हुए झलक पाए हम,
अब ऐसी भी है क्या मजबूरी?

आँखों के सूरज के आगे,
पानी की बदली है बेचारी,
न सरक सके न बरसे ही,
जाने किसकी है ये मारी॥

ये दिन जैसे जैसे उगता है,
जमती जाती नजर हमारी,
इन आँखों के भी पर्दों पर,
बढती जाये गर्द ही सारी॥

मत कहो सच


मत कहो कुछ, कोई बच्चा कुनमुना है,
सूर्य लेकर हाथ में, सच ढूंढने की कोशिश,
भी हार सकती है,
बाहर सब ओर कोहरा घना है॥

मत जगाओ देश को, यह अनसुना है,
किसान का हल, सैनिक की बन्दूक,
भी हार सकती है,
धन का नशा कई गुना है॥

मत कहो सच, आजकल बिलकुल मना है,
पत्रकारिता की बिकी कलम को छोड़ो, ये कलम,
ना हार सकती है
सत्य का न ही नामों निशां है॥

मत समझना, गरीब भी मानव जना है,
इन्हें बचाने की कोशिश करती, इंसानियत
भी हार सकती है
ये न मिट्टी का बना है॥

मत कहो कुछ, कोई बच्चा कुनमुना है

Wednesday, September 28, 2011

प्रेमी जमाना होता


न होता कोई कत्ले आम,
मंदिर मस्जिद को रोता,
होते धर्म न इश्वर अल्लाह,
इक पालनहार ही होता॥

होता हर ओर एक ही रंग,
बस प्रेमी जमाना होता,
न आती कोई आफत,
न ही जंगे तराना होता॥

पेड़ मुस्लिम है न हिन्दू है,
अब भी जंगल में रहता,
पशु पक्षी और मौसम को,
जीवन का दान ही करता॥

क्या करें सभ्यता का अब,
जब सभ्य सभ्य से लड़ता,
अधनंगा जब आदि मनुज,
बस यहाँ शांति से रहता॥

न होता कोई कत्लेआम,
बस प्रेमी जमाना होता॥

Saturday, September 24, 2011

बस यूँ ही जी लेता हूँ माँ



आज बहुत अकेला पड़ गया हूँ माँ,

या तो आज मेरे पास
सबके लिए समय नहीं है,
या फिर उन सबके पास
मेरे लिए समय नहीं है माँ,

याद नहीं शायद मैंने ही कभी
ऐसी चाहत की होगी,
या फिर ऊपर वाले ने मेरे किसी
गुनाह की सजा दी होगी माँ,

मुझे याद नहीं कि मैंने कभी
तेरा अपमान किया है,
फिर ऊपर वाले ने क्यूँ मुझे,
तुझसे दूर किया है माँ?

मैंने कभी नहीं चाहा था
इतना ऊँचा उड़ना,
कि तुझसे ही दूरी हो जाये
हजारों मीलों की, माँ,

न ही कभी चाहा था तेरी
नज़रों से ओझल होना माँ,
फिर क्यूँ इस खुले आसमान में
घने बादलों के नीचे बैठ,
इस सुनसान में किसी की
राह देख रहा हूँ माँ?

मुझे अच्छी तरह पता है
कि कोई नहीं आयेगा यहाँ
फिर क्यों हवा की आहटों के संग
मुड़ मुड़ कर पीछे देख रहा हूँ माँ?

विडम्बना तो ये है, कि तुझे
बता भी कुछ नहीं सकता हूँ माँ,
क्योंकि मेरी ये हरकत,
तेरे लिए ख़ुशी तो नहीं
बस आंसू ही ला सकती है माँ,

यही सब सोच सोच,
तेरे हिस्से का भी
खुद ही रो लेता हूँ माँ
बस यूँ ही जी लेता हूँ माँ
खुद ही रो लेता हूँ माँ

Friday, September 23, 2011

ये जीवन क्यूँ भारी लगता है?



तू आज नहीं है सम्मुख तो,
जीवन क्यूँ भारी लगता है?
मौसम भी साथ नहीं देता,
तेरा आभारी लगता है॥

इन सबकी बातें छोड़ो,
आँखे क्यूँ साथ नहीं देतीं?
इस सूखे साखे मौसम में,
क्यूँ भरा पनारा लगता है?

कागज की कश्ती डूब चुकी,
जीवन नौका की बारी है,
पतवार है जिसके हाथों में,
बस उसका पता नहीं लगता है॥

कैसे रो रोकर गाऊँ मैं?
कैसे खुद को समझाऊँ मैं?
ये चाँद भी बात नहीं करता,
तेरा ही आशिक लगता है॥

आँखे खोलूं तो पानी है,
दिखती ना कोई निशानी है,
कानों में पड़ने वाला श्वर,
बस तेरी कहानी कहता है॥

ये जीवन क्यूँ भारी लगता है?

Wednesday, September 21, 2011

बंदरों की जंग






खेल खेल की जंग है याहिन्दू मुस्लिम दंगे हैं?
न हरा रंग है न है भगवादेखो ये पूरे नंगे हैं
इन्हें ना ही नफरतना ही कुछ पाने की हसरत,
जान लिया है मैंने अब तोबस मानव ही बेढंगे हैं॥

किसने कहा श्रेष्ठ हैं मानवये तो सब भिखमंगे हैं
ये तो सब भिखमंगे हैं॥

Saturday, September 17, 2011

ये धरा नहीं है, जन्नत है



जन्मों से जिसको माँगा है,

वो पूरी होती मन्नत है।
ये धरा नहीं है, जन्नत है।

शस्य श्यामला धरती प्यारी,
ईश्वर की एक अमानत है,
सबको ये खैर मिलेगी कैसे?
बस ये तो मेरी किस्मत है॥
ये धरा नहीं है, जन्नत है।

क्रांतिवीर विस्मिल की माता,
जननी है नेता सुभाष की,
पद प्रक्षालन करता सागर,
जिसके सम्मुख शरणागत है॥
ये धरा नहीं है, जन्नत है।

बाँट दिया हो भले तुच्छ,
नेताओं ने मंदिर मस्जिद में,
भूकम्पों से ना हिलने वाला,
हिमगिरी से रक्षित भारत है॥
ये धरा नहीं है, जन्नत है।

संस्कार शुशोभित पुण्यभूमि,
हैं प्रेमराग में गाते पंछी,
दुनिया को राह दिखाने की,
इसकी ये अविरल गति है॥
ये धरा नहीं है, जन्नत है।

आदिकाल से मानव को,
जीवन का सार सिखाया है,
स्रष्टि का सारा तेज ज्ञान,
जिसके आगे नतमस्तक है॥
ये धरा नहीं है, जन्नत है।

जन्म यहाँ फिर पाना ही,
मेरा बस एक मनोरथ है,
कर लूँ चाहे जितने प्रणाम,
पर झुका रहेगा मस्तक ये॥
ये धरा नहीं है, जन्नत है।

ये धरा नहीं है, जन्नत है।

Friday, September 16, 2011

नाजायज भी जायज है



तू अगर खड़ी हो सम्मुख तो,
दिल की दुर्घटना जायज है,
आँखों की बात करूँ कैसे?
इनका ना हटना जायज है॥

स्वप्नों में उड़ना जायज है,
चाँद पकड़ना जायज है,
गर तुम हो साथ मेरे तो,
दुनिया से लड़ना जायज है॥

किसी और से आँख लड़े कैसे?
ये सब तो अब नाजायज है
तू हो मेरे आलिंगन में तो,
धरती का फटना जायज है॥

चाहें लाख बरसतें हो बादल,
उनका चिल्लाना जायज है,
गर तेरा सर हो मेरे सीने पर,
बिजली का गिरना जायज है॥

अचूक हलाहल हो सम्मुख,
मेरा पी जाना जायज है,
इक आह हो तेरे होंठों पर,
तो मेरा डर जाना जायज है॥

स्रष्टि का क्रंदन जायज है,
हिमाद्रि बिखंडन जायज है,
मेरे होंठो पर हों होंठ तेरे,
तो धरा का कम्पन जायज है॥

तू हो तीर खड़ी नदिया के,
उसका रुक जाना जायज है,
बस तेरे लिए हे प्राणप्रिये,
मेरा मिट जाना जायज है॥

Featured Post

मैं खता हूँ Main Khata Hun

मैं खता हूँ रात भर होता रहा हूँ   इस क्षितिज पर इक सुहागन बन धरा उतरी जो आँगन तोड़कर तारों से इस पर मैं दुआ बोता रहा हूँ ...