Monday, December 26, 2011

एक बदलाव विचारों का



क्या आज फिर, आज फिर उसी ने मुझे अपने वश कर रखा है,
उठाई कलम तो पाया इन आँखों में फिर आंसुओं ने घर कर रखा है।

कलम भी कहती होगी हँसकर आज फिर मुझे नमकीन होना होगा
क्या आज फिर मुझे इसके आंसुओं को ही शब्दों का रूप देना होगा।

अरे रो लिए बहुत उनके लिए जिन्होंने अश्रु को बस पानी समझा,
अब देखो उन्हें जिन्होंने देश के लिए रक्त को पानी तक न समझा।

......अरे अब किसी ऐसे वैसे उनके लिए तडपना गुमराह करता है,
तड़पो तो देश के लिए, तिरंगा कफ़न भी माशूक सा प्यार करता है।

अब व्यर्थ लेखनी घुमाना, अक्षरों में अश्रु बहाना, व्यर्थ दिल जलाना,
आज रक्तिम कलम से रचो रचयिता, फिर एक नव क्रांति का फ़साना।

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