Sunday, December 25, 2011

एक व्यक्ति नहीं एक व्यक्तित्व: माननीय अटल विहारी बाजपेयी


पता नहीं इस देश पर कैसा अभिशाप है? पता नहीं हम किस रोग से पीड़ित हैं? जब कभी संकट की घड़ी आती है तब ये देश एक हो जाता है। लेकिन जैसे ही संकट की घड़ी चली, हम एक दूसरे को गिराने के, एक दूसरे का महत्व कम करने के, अनावश्यक अप्रासंगिक मामले खड़े करने में लग जाते हैं।

यूनाइटेड नेशन्स में बहस हुयी, ये कहा गया की आतंकवाद क्यों होता है इसका कारण देखा जाना चाहिए। कोई भी कारण ऐसा नहीं हो सकता जो औरतों के, बच्चों के कत्लेआम का समर्थन करता हो। कोई भी कारण।

नव दधीचि हड्डियाँ जलाएँ, आओ फिर से दिया जलाएँ,
आओ फिर से दिया जलाएँ,आओ फिर से दिया जलाएँ

हार नहीं मानूँगा, रार नहीं ठानूँगा,
काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूँ,
गीत नया गाता हूँ, गीत नया गाता हूँ।

    ये शब्द मेरे नहीं, एक व्यक्ति के नहीं, एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व माननीय श्री अटल विहारी बाजपेयी के शब्द हैं। ये पोस्ट मैंने किसी भी राजनैतिक दल के समर्थन में नहीं की है।
    मेरे पास उपयुक्त शब्द नहीं  हैं उस व्यक्तित्व के बारे में कुछ लिखने के लिए। कोशिश भी नहीं करना चाहता, क्योंकि मुझे पता है, उस व्यक्तित्व को शब्दों में उकेरना, मुझे नहीं लगता संभव है, कम से कम मेरे लिए तो नहीं।
जय हिन्द, जय भारत

गीत नहीं गाता हूँ, गीत नहीं गाता हूँ
बेनकाब चेहरे हैं दाग बड़े गहरे हैं
टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूँ
गीत नहीं गाता हूँ, गीत नहीं गाता हूँ
लगी कुछ ऐसी नज़र, बिखरा शीशे का शहर,
अपनों के मेले में, मीत नहीं पता हूँ ,
पीठ में छूरी सा चाँद, राहु गया रेखा फान्द,
मुक्ति के शानो में, बंध जाता हूँ,
गीत नहीं गाता हूँ, गीत नहीं गाता हूँ (II)

गीत नया गाता हूँ, गीत नया गाता हूँ
टूटे हुए तारों से फूटे वासंती स्वर
पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर
झरे सब पीले पात, कोयल की कुहुक रात
प्राची में, अरुणिमा की रेत देख पाता हूँ
गीत नया गाता हूँ, गीत नया गाता हूँ
टूटे हुए सपने की सुने कौन, सिसकी
अंतर को चीर व्यथा, पलकों पर ठिठकी
हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा
काल के कपाल पर, लिखता-मिटाता हूँ
गीत नया गाता हूँ, गीत नया गाता हूँ
-श्री अटल विहारी वाजपेयी
Vedio और kavita, youtube से, उनके भाषण के ये शब्द आज तक से, और image गूगल से साभार

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