Saturday, December 24, 2011

नमकीन कलम


क्या आज फिर, आज फिर उसी ने मुझे अपने वश कर रखा है,
उठाई कलम तो पाया इन आँखों में फिर आंसुओं ने घर कर रखा है।

कलम भी कहती होगी हँसकर आज फिर मुझे नमकीन होना होगा
क्या आज फिर मुझे इसके आंसुओं को ही शब्दों का रूप देना होगा।

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