Monday, December 5, 2011

ये पागलपन है मेरा



हम इस पाखंडी दुनिया से अक्सर दूर दूर से रहते हैं,
जो मन में आता उल्टा सीधा ज़ोर ज़ोर से कहते हैं,
ये बेढंगापन है मेरा,
स्वीकार करो तो कर लो,
नहीं तो खुशकिस्मत हैं हम,
अक्सर हँसते गाते रहते हैं।

हम चलते हैं अपनी राहों पर पदचिन्ह न सम्मुख रखते हैं,
मंजिल मिले, मिले न फिर भी, मर्यादित बढ़ते रहते हैं,
ये आवारापन है मेरा,
चुनना चाहो तो चुन लो,
नहीं तो मनमौजी हैं हम,
अब चलते फिरते ही रहते हैं।

दुख में हँसने की आदत है पूरी दुनिया से लड़ते रहते हैं,
अनजानों के साथ बैठ हम दिल की ही बातें करते हैं,
ये पागलपन है मेरा,
चाहो तो इसको समझो,
वैसे कलम साथ है मेरे,
हम लिखते पढते ही रहते हैं।

8 comments:

  1. कोमल भावो की बेहतरीन अभिवयक्ति.....

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  2. sacche man se khud ko parkhne ki takt bahutkam logo me hoti hai ,, apne o himmat dikhai ,,ham apka tahe dil se swagt karte hai,,,

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  3. very nice..i like ur unusual style of rhyming...
    and pls correct spelling in last line..its a typing mistake- पड़ते नहीं पढते लिखना चाह रहे थे ना आप?

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  4. दुख में हंसने की आदत है ............सुंदर पंक्तियाँ अच्छी लगी

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  5. आपकी प्रवि्ष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी की जा रही है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल उद्देश्य से दी जा रही है!

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  6. App sabka bahut bahut abhar ...

    Han Vidya ji ... Shukriya sudhar ke liye ..

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  7. Bahut sunder abhivyaki, sunder prayas , baat me kuch dam hai................................. lage raho Manmoji (Neeraj) bhai. Wishin you Good luck.

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  8. बेहतरीन अभिव्यक्ति .... बधाईयाँ जी

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प्रशंसा नहीं आलोचना अपेक्षित है --

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