Monday, December 5, 2011

ये पागलपन है मेरा



हम इस पाखंडी दुनिया से अक्सर दूर दूर से रहते हैं,
जो मन में आता उल्टा सीधा ज़ोर ज़ोर से कहते हैं,
ये बेढंगापन है मेरा,
स्वीकार करो तो कर लो,
नहीं तो खुशकिस्मत हैं हम,
अक्सर हँसते गाते रहते हैं।

हम चलते हैं अपनी राहों पर पदचिन्ह न सम्मुख रखते हैं,
मंजिल मिले, मिले न फिर भी, मर्यादित बढ़ते रहते हैं,
ये आवारापन है मेरा,
चुनना चाहो तो चुन लो,
नहीं तो मनमौजी हैं हम,
अब चलते फिरते ही रहते हैं।

दुख में हँसने की आदत है पूरी दुनिया से लड़ते रहते हैं,
अनजानों के साथ बैठ हम दिल की ही बातें करते हैं,
ये पागलपन है मेरा,
चाहो तो इसको समझो,
वैसे कलम साथ है मेरे,
हम लिखते पढते ही रहते हैं।

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