Sunday, December 4, 2011

क्या अजीब जिंदगी है ये


आज अभी जो भी मेरे मन में आया मैं लिखता चला गया। इन शब्दों को व्यवस्थित करने की कोशिश नहीं की, न हीं लिख कर ये सोचा की इनका मतलब क्या निकाल रहा है?
     आप में से किसी को समझ आए इनका अर्थ, इनका भाव, मैंने क्या कह डाला है इन शब्दों के माध्यम से, तो मुझे भी जरूर बताइएगा।

क्या अजीब दिन है आज?
अकेला गुमसुम बैठा था, सोचा बाँसुरी बजाता हूँ,
फिर हज़ार कोशिशों के बाद, आज एक ही बोरिंग सी धुन ही क्यूँ निकाल पाता हूँ?

क्या अजीब दिन है आज?
कुछ गुनगुनाता हूँ, फिर उन्हीं शब्दों के अर्थों में ही खो जाता हूँ,
वापस आता हूँ, क्या क्या करना है आज सूची बनाता हूँ,
फिर पता नहीं क्यूँ, उनमे से कोई भी काम आज शुरू नहीं कर पाता हूँ?

क्या अजीब दिन है आज?
मुसकुराता हूँ कुछ सोचकर,
फिर ज़ोर से हँसना चाहता हूँ,
ये जानकार, कि मुझे पता ही नहीं, कि मैं किस वजह से मुस्कुरा रहा हूँ?

क्या अजीब दिन है आज?
सूरज के निकलने का इंतजार करता हूँ,
दिन के परवान चढ़ने का इंतजार करता हूँ,
और ये सब हो जाने पर, बेसब्री से सूरज के जाने का इंतजार कर रहा हूँ।

क्या अजीब जिंदगी है ये?
जीवन भर खुद के और बड़ा होने का इंतजार करता हूँ,
बालू पर उकेरे सपनों के सच होने का इंतजार करता हूँ,
जीवन समझने की कोशिश और इसी से प्यार करता हूँ,
और अब अचानक एक क्षण के बाद, खुद के ही ढलने का इंतजार करता हूँ।

क्या अजीब दिन है आज?
क्या अजीब जिंदगी है ये?

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