Thursday, November 17, 2011

बस उसकी ही अंगड़ाई में



इन सर्द अँधेरी रातों में, रुक रुक होती बरसातों में।
वो दीप आस का लगता था, तेरी उन भोली बातों में॥

साथ चले दो कदमों में, सिहरन होती थी रग रग में।
दूरी थी बहुत जरा सी पर, मन उड़ता था बस मीलों में॥

इस सागर की गहराई सी, तेरे मन की चतुराई में।
सत्प्रेम अंकुरित मन मेरा, विकसित होता तरुणाई में॥

छल छल करती नदिया या, गंभीर जलधि का अंतरतम।
जीवन की अविरल गंगा थी या था सावन का चंचलपन?

मन की सारी गुपचुप बातें, होती उनसे चतुराई में,
सब कुछ कह डाला हमने, हम रिक्त हुये तन्हाई में॥

हम निपट अकेले रहते हैं, अनचाही विवश जुदाई में।
वक्त लगे ठहरा रहता है, बस उसकी ही अंगड़ाई में॥

अब किससे और कैसे बोलें, जब कोई साथ नहीं देता।
हमको बस लिखना पड़ता है, इस सुंदर रीती तन्हाई में॥

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