Sunday, November 6, 2011

सूरज का एकाकीपन



एकाकी मानव का अस्तित्व प्रदर्शित,
ये सूरज का एकाकीपन है,
अभी मद्धिम है आभा इसकी,
या प्रखर तेज का सीधापन है?

सतत प्रगति का है ध्वजवाहक,
या है समय का अनुसंधान,
ये सूरज का आवारापन है,
या मानव जीवन का बंजारापन?

ये जीवन के अरुण क्षितिज पर,
सतत निखरता बालकपन है,
उड़ उड़ कलरव करते पंछी,
और बिहंसती प्रकृति साथ है,

खेल खेल में बढ़ते बालक,
की भांति सूर्य का चढ़ जाना है,
ये विकसित होता मानव मन है,
या सुन्दर होता अम्बर तन है?

12 comments:

  1. सुंदर प्रस्तुति।

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  2. bahut khub likha hai sir ji...
    jai hind jai bharat

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  3. बहुत उम्दा!
    --
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है! सूचनार्थ!

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  4. प्रभावी ... लाजवाब प्रस्तुति है ...

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  5. वाह ...सुन्दर...
    सादर...

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  6. खूबसूरत रचना .. सोचने पर मजबूर करती हुई ..

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  7. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल आज 24-- 11 - 2011 को यहाँ भी है

    ...नयी पुरानी हलचल में आज ..बिहारी समझ बैठा है क्या ?

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  8. अति प्रखरता की नियति ही है अकेलापन !

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  9. बहुत सुन्दर......intelligent poetry.

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प्रशंसा नहीं आलोचना अपेक्षित है --

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