Saturday, October 15, 2011

जाग देश के स्वाभिमान


वह शस्य श्यामला भारत माँ, वहाँ खड़ी तुझे दुलराती है।
बुलवाती है सारे मौसम, पेड़ों से छाँव दिलाती है।
बसंत के सुन्दर फूलों में, महक बन कर बस जाती है।

धनलिप्सा में रत भारतवासी, करता है उसका अपमान,
अपने जीवन के धनु पर, करो विचारों का संधान॥
जाग देश के स्वाभिमान।

कटे अंग क्षत विक्षत अरु, आँखों में देख अश्रु उज्जवल,
हे भारतवासी अब तुझको, माँ फिर से पाना चाहती है।
अपनी टूटती भुजाओं को देख, फिर भूत में जाना चाहती है।

अपने लड़ते मुर्ख पुत्र देख, नष्ट होना चाहे, अपना अपराध मान,
मृगतृष्णा लिप्त प्रथाएं छोड़, हो अपनी मिटटी का अभिमान॥
जाग देश के स्वाभिमान।

लालच और मूर्खता की हद, झुकने में भी स्वार्थ समाहित।
जब हो प्रपंच की परकाष्ठा, आलसी अकर्मठ खड़े जोर से रोते।
समरांगण में सोती तलवार, म्यान में, हम घरों में सोते।

भुजदंडों में यौवन का करो, छाती में साहस का अनुसंधान।
कांप उठे जल थल अम्बर, गुंजित हो माँ का सम्मान॥
जाग देश के स्वाभिमान।

मौत एक बार आती है, आज स्वयं चुनौती दो।
देश के गद्दारों के सीनों पर, अब तो तलवार धरो।
शत्रु बहुत हैं, अब एक बार फिर, विश्वविजयी अभियान करो।

सीने में ज्वालामुखी, हाथों में, अंगार, फिर हो ऐसा संग्राम,
दशो दिशायें कांपे, विश्व झुके फिर, फैलाओ ऐसा कीर्तिमान॥
जाग देश के स्वाभिमान।

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