Wednesday, October 19, 2011

आज फिर आया नयन में एक आँसू


उनके बिना धूप का ये वक्त गुजरा बहुत धीरे,
बहुत कुछ बन कर मिट चुका है हर सबेरे,
यादों से दूर खुद को व्यस्त रखने की लगन में,
ये आँसू किसी को दिख न जाए चिंता है घेरे॥

वो भूली नहीं होंगी मुझे अबतलक ये सोच,
देख आज फिर आया नयन में एक आँसू॥
 Image from google
वायु भी मदहोश अब होने न पाई,
चहुं ओर फैले वक्त के बादल घनेरे,
जिसको बनाया हमसफर था ईश ने,
वो मेरी छाया फिरे मुझसे चक्षु फेरे॥

क्यूँ न हो ऐसा, वो साथी है दिवस की,
क्यूँ मैं खोलूँ आँख जब धूप में है रात्रि घेरे,
अश्रु और प्रेम का अनबूझ रिश्ता है समझ,
देख आज फिर आया नयन में एक आँसू॥

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