Tuesday, October 18, 2011

मैंने सच देखा


बिन चप्पल भरी दुपहरी देखा,
सर्दी में तन की गठरी देखा,
देखा मानव को नंगा फिरते,
मानवता को अंधा बहरा देखा॥
Image From Google 
कौओं का रंग सुनहरा देखा,
पशुओं का महलों में डेरा देखा,
धन की भूख है इतनी ज्यादा,
घर में दुश्मन का पहरा देखा॥

9 comments:

  1. aaj ke bharat ki dash ka varnan kiya hai aapne shayad,,,,,
    har baat kah di
    jai hind jai barat

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  2. katu stya....aaj ka nanga sach.....bahut khub

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  3. इस प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी की जा रही है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  4. बहुत बढ़िया प्रस्तुति ||

    बधाई स्वीकारें ||

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  5. जीवन के यथार्थ का चित्रण करती सशक्त रचना !

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  6. बहुत सार्थक रचना....
    सादर आभार....

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प्रशंसा नहीं आलोचना अपेक्षित है --

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