Monday, October 17, 2011

मैं अगस्त्य बनना चाहता हूँ


मैं इक नया इतिहास लिखना चाहता हूँ,
सत्य का कर्णभेदी उद्घोष करना चाहता हूँ,
असत्य के इस अथाह सागर के सम्पूर्ण,
पान हित नया अगस्त्य बनना चाहता हूँ॥

अगणित निर्दोषों की करुण पुकारें सुन,
मिथ्या गर्व की चिरपरिचित हुंकारें सुन,
निराशा की अपरिमित चीत्कारों के मध्य,
विश्व का सबसे सुरीला गान बनना चाहता हूँ॥

सतत नफरत की जीर्ण शीर्ण दीवारों पर,
क्षमा की घातक चोट करना चाहता हूँ,
हिंसा के इस ज्वलंत संग्राम के मध्य,
प्रेम का सात्विक अभियान बनना चाहता हूँ॥

भारत माँ के खंडित भाग्य की कराहें सुन,
स्वयं को काट माँ के घाव भरना चाहता हूँ,
राष्ट्र में व्याप्त अनैतिक शीत रात्रि के मध्य,
सूर्य बन देश का अभिमान बनना चाहता हूँ॥

मैं, माँ तेरा सम्मान बनना चाहता हूँ,
हे धरा, मैं तेरा अभिमान बनना चाहता हूँ।

7 comments:

  1. Sundar vichar.
    In vicharon ke sath iswar ka aashirwad jaroor milega.
    Badhai.

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  2. बहुत खूबसूरत रचना नीरज जी ..बधाई!

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  3. बहुत-बहुत बधाई इस प्रेरणात्मक गीत के लिये, आज भारत माँ को आप जैसे कवियों की बहुत जरूरत है...

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  4. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच की जी रही है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  5. prerna mili hai ise padhkar,
    bahut hi prerna dayak rachna
    jai hind jai bharat

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प्रशंसा नहीं आलोचना अपेक्षित है --

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