Thursday, September 29, 2011

ऐसी भी है क्या मजबूरी


मैंने एक विराम लिया क्या,
तुमने कर ली मीलों की दूरी,
कई दिन हुए झलक पाए हम,
अब ऐसी भी है क्या मजबूरी?

आँखों के सूरज के आगे,
पानी की बदली है बेचारी,
न सरक सके न बरसे ही,
जाने किसकी है ये मारी॥

ये दिन जैसे जैसे उगता है,
जमती जाती नजर हमारी,
इन आँखों के भी पर्दों पर,
बढती जाये गर्द ही सारी॥

Featured Post

मैं खता हूँ Main Khata Hun

मैं खता हूँ रात भर होता रहा हूँ   इस क्षितिज पर इक सुहागन बन धरा उतरी जो आँगन तोड़कर तारों से इस पर मैं दुआ बोता रहा हूँ ...