Tuesday, July 26, 2011

ये तेरा दरबार न था


यूँ जीने की ख्वाहिस ना थी,
यूँ हँसने का एतबार न था,
बस इक पगली के जाने पर,
मुझे रोने से इनकार था॥

मैं अपने सपने तोड़ चुका,
हँसना भी शायद भूल चुका,
बस बचा एक ही लक्ष्य आज,
माँ का सपना, पूरा न था॥

माँ का दिया हुआ संसार,
लूट गया है कोई, समझा,
मैं भूल गया था शायद यह,
की ये तेरा दरबार न था॥

मुझको लुटने का हक भी,
जब नहीं दिया था उस माँ ने,
तब किसी लड़की के पीछे,
मेरा लुट जाना इन्साफ न था॥

मैं भूल गया था शायद यह,
की ये तेरा दरबार न था॥


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