Thursday, July 21, 2011

लब तक खींचा अरु छोड़ गयी


मैं जोकर था क्या सर्कस का,
देखा, मुस्काया अरु भूल गयी।
या तीर था तेरे तरकश का,
लब तक खींचा अरु छोड़ गयी॥

मैं तो अंकुर हूँ जीवन का,
संसार तेरा भर देता मैं।
इक बार तू मेरी हो जाती,
खुशियों का महल कर देता मैं॥

स्वाभिमान है जीवित अब भी,
प्यार की भीख न तुझसे मांगूंगा।
जी लूँगा यूँ ही मरते मरते,
तुझसे न कभी मुह खोलूँगा॥

कलम चलेगी जीवन भर,
तेरी यादों से निखर निखर।
तेरे सपनों में जी जी कर,
बस यूँ ही अब खो जाऊंगा॥

बिन नाम लिए तेरा यूँ ही,
बदनाम तुझे कर जाऊंगा॥

चाहत नहीं प्रशंसा की अब,
न ज्यादा जीने की, ख्वाहिश है।
बस बची जिंदगी अब सारी,
न रही तेरी फरमाईश है॥

मैं तो मिट जाऊंगा पर पहले,
अमरत्व तुझे दे जाऊंगा।
बिन नाम लिए तेरा यूँ ही,
बदनाम तुझे कर जाऊंगा॥

बिन नाम लिए तेरा यूँ ही,
बदनाम तुझे कर जाऊंगा॥

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