Saturday, July 16, 2011

आँखे ये रोज बरसती हैं ?

आज ये दुनिया रंगहीन क्यूँ लगती है ?
आज ये हवा भी नटखट नही होती है ?
मेरी बातें लोगों को अर्थहीन क्यूँ लगती है ?
ये नींद भी आँखों से दूर दूर क्यूँ रहती है ?
पास नही तू फ़िर भी, क्यूँ ये चोरी करती है ?

दिल का तो पता नही, बहुत दिनों से गायब है,
इन दिनों ये महफ़िल भी, सूनी सूनी सी लगती है।
पता नहीं वो दिन क्यों, रोज नही आता है ?
जिस दिन थोडी तुझको मेरी, याद हुया करती है ॥

अनजाने मौसम में, क्यूँ आँखे ये रोज बरसती हैं ?
जीने की इसी तरह अब तो, आदत सी लगती है ।
पता चला कुछ दिन पहले शायद आँखे बीमार पडीं,
इन आँखो के रोज बरसने से अब तो सर्दी सी लगती है ॥
(लगता है बिना मौसम जाने, सर्दी है या गर्मी, रोज बरसने से इन आँखो को ही सर्दी हो गयी है)

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