Monday, June 20, 2011

क्यूँ लिख दूँ मैं ?


      आज आफ़िस से घर आते समय, बाइक पर मन में विचार आया, कि चलो आज कुछ लिखते हैं, प्रश्न उभरा क्यूँ ? अच्छा चलो कोइ कारण मिल भी जाये तो किस पर लिखोगे ? ज़बाब मिला बिषयों की कमी पडी है क्या ? चलो मान लिया तो लिखोगे क्या ? तो सोचा चलो मन की इसी हालत के बारे मे ही लिखा जाये …


तीन प्रश्न हैं, क्यूँ लिख दूँ मैं ? कारण हो तो किस पर लिख दूँ ?
बिषय सामने हो तो फ़िर मैं, यह सोचूँ कि क्या लिख दूँ मैं ?

लिखूँ स्वदेश पर या विदेश पर, नेताओं के राग द्वैष पर ,
गाँधी को रख्खूँ सम्मुख या, आजाद विस्मिल और सुभाष पर ?

नही समझ आता है मुझको, लिख ही दूँ तो क्यूँ लिख दूँ मैं,
राष्ट्र के नेताओं की मनमानी, सबके सम्मुख क्यूँ कह दूँ मैं ?

मुझे पता है देश रो रहा, हर भारतवासी दफ़न हो रहा ,
जीवन जीने आया मानव, यहाँ स्वयं का कफ़न ढो रहा ।

पूरे भारत का नेतृत्व आज, खडा सामने हुआ पद-दलित,
किस-किस का, क्या-क्या लिख दूँ मैं, कलम आज हो चुकी कलंकित ।

सब तो अब मृतप्राय पडे हैं, तो फ़िर बोलो क्यूँ लिख दूँ मैं ?
सब तो अब मृतप्राय पडे हैं 

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