Tuesday, May 31, 2011

आज कुछ नया करना चाहता हूँ


आज कुछ नया करना चाहता हूँ । कुछ भी, कुछ अच्छा, कुछ बुरा, कुछ अलग और कुछ अनोखा । आज फ़िर से जीना चहता हूँ, फ़िर से रोना चहता हूँ, फ़िर से हँसना चाहता हूँ ।

      अरे याद आया, बहुत दिन हुए मैंने माँ से मार नही खाई, आज फ़िर उससे पिटना चाहता हूँ । आज क्यूँ वो आँखो में आँसू लिये, हाँथों में छ्डी लिये और गुस्से से भरा हुआ चेहरा, घूम रहा है मेरी आँखो के सामने; वो मारती जाती है और खुद रोती जाती है । माँ आज मैं फ़िर से पिटना चाहता हूँ ।

आज कुछ नया करना चाहता हूँ ।

      मुझे पता है कि मैं आज भी गलतियाँ करता हूँ, आज भी तुम्हारा दिल दुखाता हूँ, आज भी तुम्हारी बात नही मानता फ़िर आज, आज क़्यूँ तुम्हारे हाथ नहीं उठते ? शायद बडा हो गया हूँ इसलिए । माँ आज मैं फ़िर से छोटा होना चाहता हूँ, फ़िर से पिटना चाहता हूँ ।

आज कुछ नया करना चाहता हूँ ।

      मैं फ़िर से अपनी पिटाई पर, अपने भाई – बहनों को, बिना वजह रोते हुये देखना चाहता हूँ । हाँ हो सकता है कि इसमे किसी को मेरा स्वार्थ लगे पर फ़िर भी मैं उस एहसास को, उनके रोने में छिपे उनके प्यार को फ़िर से पाना चाहता हूँ ।

आज कुछ नया करना चाहता हूँ ।

      बहुत जी लिया मैने, अब कुछ अलग करना चाहता हूँ । बहुत कर लिया उसे याद मैंने, अब उसे याद आना चाहता हूँ । बहुत तडपा हूँ मैं, अब इक बार फ़िर उसे हँसते हुये देखना चाहता हूँ । दाँतों से अपने होंठ चबाते हुये देखना चाहता हूँ ।

आज कुछ नया करना चाहता हूँ ।

      आज फ़िर से आसमान छूने का सपना देखना चाहता हूँ, आज फ़िर हवा में उडना चाहता हूँ । और इस बार इन सपनों को हकीकत में उतारना चाहता हूँ ।

आज कुछ नया करना चाहता हूँ । कुछ भी, कुछ अच्छा, कुछ बुरा, कुछ अलग और कुछ अनोखा । आज फ़िर से जीना चहता हूँ, फ़िर से रोना चहता हूँ, फ़िर से हँसना चाहता हूँ ।

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