Sunday, May 8, 2011

आठ पापों का घड़ा

                 एक बार कवि कालिदास बाजार में घूमने निकले। एक स्त्री घड़ा और कुछ कटोरियाँ लेकर बैठी थी ग्राहकों के इन्तजार में। कविराज की कौतूहल हुआ कि यह महिला क्या बेचती है ! पास जाकर पूछा :
              "बहन ! तुम क्या बेचती हो ?"
              "मैं पाप बेचती हूँ। मैं लोगों से स्वयं कहती हूँ कि मेरे पास पाप है, मर्जी हो तो ले लो। फिर भी लोग चाहत पूर्वक पाप ले जाते हैं।" महिला ने कुछ अजीब सी बात कही। कालिदास उलझन में पड़ गये। पूछाः
             "घड़े में कोई पाप होता है?"
             "हाँ... हाँ.. होता है, जरूर होता है। देखो जी, मेरे इस घड़े में आठ पाप भरे हुए हैं- बुद्धिनाश, पागलपन, लड़ाई-झगड़े, बेहोशी, विवेक का नाश, सदगुण का नाश, सुखों का अन्त और नर्क में ले जाने वाले तमाम दुष्कृत्य।"
             "अरे बहन ! इतने सारे पाप बताती है तो आखिर है क्या तेरे घड़े में? स्पष्टता से बता तो कुछ समझ में आवे।" कालिदास की उत्सुकता बढ़ रही थी।
             वह स्त्री बोलीः 'शराब ! शराब !! शराब!!! यह शराब ही उन सब पापों की जननी है। जो शराब पीता है वह उन आठों पापों का शिकार बनता है।" कालिदास उस महिला की चतुराई पर खुश हो गये।

En Bottles ko main kya naam du ?
              ये मदिरा कभी कभी इन्सान को हैवान क्यूं बना देती है ? कभी कभी ये लोगों को अपने रिश्तों से, नातों से, दूसरे व्यक्तियों से, समाज से, सभ्यता से, इन्सानियत से, और कभी कभी तो स्वयं से ही सम्मानित और महत्वपूर्ण क्यूं लगने लगती है ? क्यूं कभी कभी ये किसी के दाम्पत्य जीवन का, कभी किसी मित्रता का, कभी किसी पवित्र उद्देश्य का और कभी किसी वयक्तिविशेष का ही व्यवधान बनकर रह जाती है ? और यही कभी कभी किसी ऐसी घटना का बीज बन जाती है जो किसी का दुर्भाग्य बन जाती है, किसी का जीवन नष्ट कर देती है और कभी, कभी उसी व्यक्ति के लिये जीवन भर उसी के चरित्र का कलंक बन कर रह जाती है। आखिर क्यूं ?

                    हाँ ये सच है जो भी ज्येष्ठ बच्चन जी ने कहा है मधुशाला में :-

मुसलमान औ' हिन्दू है दो, एक, मगर, उनका प्याला,
एक, मगर, उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला,
दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते,
बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर मेल कराती मधुशाला!।।

                  हाँ सच है, और एक सच ये भी है कि यही मदिरा कभी कभी किसी के जीवन मे इतना विष घोल देती है कि ना केवल उसका जीवन अपितु उसके निकट सम्बंधियों और मित्रों का जीवन भी पशुवत कर देती है । यही मदिरा कभी कभी मित्रों के किसी छोटे से मनमुटाव को बढावा दे कर जीवन मरण की शत्रुता बना देती है। हाँ कभी ये मदिरा कराती है मेल गर्व के पर्वत पिघला कर और कभी यही मदिरा मजबूर कर देती है व्यक्तियों को अपनी सभ्यता, अपना चरित्र, अपना स्वाभिमान और अपने सम्मान को ताक पर रखकर, मनुष्य जीवन की क्षुद्र पिपासायों को महत्व देने पर।

कहा है किसी ने :
दारू पीने वाला, मैं हूँ दारू पीने वाला ।
मुझको दुश्मन क्या मारेगें, मैं तो खुद ही मरने वाला ॥

ये वही मदिरा है जो कभी किसी निर्दोष राह चलते व्यक्ति के हँसते खेलते खुशहाल जीवन में आग लगा देती है, क्या गलती होगी उस व्यक्ति की और उस व्यक्ति के परिवार की जो किसी निरंकुश मदिरा पीने वाले की असावधानी का फ़ल भुगते।

बच्चन जी ने कहा है कि …
बिना पिये जो मधुशाला को बुरा कहे, वह मतवाला,
पी लेने पर तो उसके मुहँ पर पड़ जाएगा ताला 

               मुझे नहीं समझ आता कि उन्होने ऐसा क़्यूं कहा कि मदिरा को बुरा कहने वाला एक बार उसे पी लेने पर मदिरा को बुरा कहना बन्द कर देगा। एक बार मदिरा पी लेने के बाद क्या मदिरा के बुरे प्रभाव नष्ट हो जाएगें, या फ़िर उसे मदिरा के ये बुरे प्रभाव दिखना बन्द हो जाएगें। मुझे तो इनमे से कछ भी सच नहीं लगता। मैं इतने विश्वास से यह कह सकता हूँ क्यूँकि मैं ये प्रयोग स्वयं करके देख चुका हुँ।
              समाचार पत्र देख लिजिये किसी भी दिन का, कोई शराब के नशे में अपने पिता को पीटता मिल जायेगा, कोई अपनी पत्नी या बच्चों को, कोई इसी शराब मे जहर बेचता है तो कोई इसी के सहारे कोकेन और हिरोइन जैसे व्यसन।
             आत्मभाव से सृष्टि का सम्राट बनने के लिए निर्मित मानव जीवभाव से कैसे पतन के गर्त में गिरता जाता है और स्वयं को ही कष्ट देता है उसका उत्तम उदाहरण देखना हो तो आप धूम्रपान और सुरा जैसे व्यसनों के प्रेमी व्यक्ति को देख लीजिए। पाश्चात्य शिक्षा के रंग में हुए लोग कई बार मानते हैं कि दारू का थोड़ा इस्तेमाल आवश्यक और लाभप्रद है। वे अपने आपको सुधरे हुए मानते हैं। लेकिन यह उनकी भ्रांति है। डॉ. टी.एल. निकल्स लिखते हैं- "जीवन के लिए किसी भी प्रकार और किसी भी मात्रा में अल्कोहल की आवश्यकता नहीं है। दारू से कोई भी लाभ होना असंभव है। दारू से नशा उत्पन्न होता है लेकिन साथ ही साथ अनेक रोग भी पैदा होते हैं। जो लोग सयाने हैं और सोच समझ सकते हैं, वे लोग मादक पदार्थों से दूर रहते हैं। भगवान ने मनुष्य को बुद्धि दी है, इससे बुद्धिपूर्वक सोचकर उसे दारू से दूर रहना चाहिए।"

जाम पर जाम पीने से क्या फायदा
रात बीती सुबह को उतर जायेगी।
तू हरि रस की प्यालियाँ पी ले
तेरी सारी ज़िन्दगी सुधर जाएगी।।

प्रसिद्ध दार्शनिक डायोजिनीज को उनके मित्रों ने महँगे शराब का जाम भर दिया। डायोजिनीज ने कचरापेटी में डाल दिया। मित्रों ने कहाः "इतनी कीमती शराब आपने बिगाड़ दी?"
      "तुम क्या कर रहे हो?" डायोजिनीज ने पूछा।
      "हम पी रहे हैं।" जवाब मिला।
      "मैंने जो चीज कचरापेटी में उड़ेली वही चीज तुम अपने मुँह में उड़ेलकर अपना विनाश कर रहे हो। मैंने तो शराब ही बिगाड़ी लेकिन तुम शराब और जीवन दोनों बिगाड़ रहे हो।"

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