Wednesday, April 27, 2011

राजा हरिश्चन्द्र का सतयुग


           तारा (राजा हरिश्चन्द्र की पत्नी) भटकती रही दर-दर अपने बेटे रोह्ताश्व का शव लिये उस महान युग के महान लोगो के पास ना
 तो इतनी दया थी कि उस बेचारी को कोइ प्रस्रय देता और ना ही इतना धन की उसे कुछ सहारा ही देता । वाह रे सतयुग और उसके सतयुगी । क्या समय था कि लोग उस समय भी बिकते थे और कलयुग मे भी । राजा ने बेच दिया अपनी पत्नी और अपने मासूम बेटे को और फिर स्वं को, सतयुगी जनमानस ने उन्हे खरीद भी लिया । प्रारम्भ से देखे तो कैसे तपस्वी ॠषि थे जिन्होने एक योग्य प्रजाबत्सल आदर्श राजा से राज्य ले लिया, क्यूँ ? नही समझ आता इस मानव मष्तिष्क को । क्या करना था उन्हे इस राज्य का ?

          ज़बकि हमने तो बचपन मे पढ़ा था कि युग चार हुआ करते हैं, सबसे पहले सतयुग (अदर्श युग) जहाँ राजा भी आदर्श और प्रजा भी , फिर आता है भगवान राम का त्रेतायुग (मर्यादापुरुषोत्तम का युग), फिर द्वापरयुग (भगवान कृष्ण) और अन्त मे हमारा कलयुग ।

          वाह रे अदर्श युग जहा लोगो के मन मे इतना दया भाव न था जो भट्कती बेसहारा एक माँ को किसी ने सहारा देने कि जरुरत नही समझी । ये सत्य क युग था या दसता का युग ? अगर उस समय भी मनुष्य के क्रय विक्रय का आम रिवाज था तो क्या अन्तर रह गया उस सत्य के युग मे और मुगलकालीन कलयुग मे ?
कोइ बतायेगा मुझे कि कि कैसा था ये राजा हरिश्चन्द्र का सतयुग ?

                    reference -- गान्धी बेनकाब : हंसराज रहबर
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