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Thursday, June 16, 2016

तू दंड दे मेरी खता है Tu dand de Meri khata hai

ऐ मनुज तू
काट मुझको
दंड दे मेरी खता है,
खोदकर अपनी
जडें ही
मृत्यु से क्यों तोलता है?

धार दे चाकू छुरी में, और पैनी कर कुल्हाड़ी,
घोंप दे मेरे हृदय में, होश खो पी खूब ताड़ी,
जान ले मेरी
हिचक मत
बेवजह क्यों डोलता है?

रुक गया क्यों, साँस लेने की जरूरत ही तुझे क्या,
मौत से मेरी मरेगा कौन, क्यों, कैसे मुझे क्या,
सोच, तू अपनी
रगों में
ही जहर क्यों घोलता है?

नष्ट कर सारे वनों को, खेत तू सारे जला दे,
सूख जब जाए तलैया, ईंट पत्थर से सजा दे,
छेद कर आकाश
तू अपनी
छतें क्यों खोलता है?

है जमीं तेरी बपौती, और पानी भी हवा भी,
छीन ले मातृत्व इसका, और विष दे कर दवा भी,
बाँझ कर फिर
इस धरा को
मातु ही क्यों बोलता है?

--- नीरज द्विवेदी


Ae manuj tu kaat mujho
dand de meri khata hai
Khodkar apni jadein hi
mrityu se kyon taulta hai

Dhar de chaku churi mein, 
aur paini kar kulhadi,
Ghonp de mere hriday mein, 
hosh kho pee khoob tadi,
Jaan le meri hichak mat
bevajah kyon dolta hai?

Ruk gaya kyon, sans lene 
ki jarurat hi tujhe kya,
Maut se meri marega kaun, 
kyon kaise mujhe kya,
Soch, tu apni ragon mein hi 
jahar kyon gholta hai?

Nasht kar sare vanon ko, 
khet tu saare jala de,
Suukh jab jaye talaiya, 
iint patthar se saja de,
Ched kar akash tu apni
chatein kyon kholta hai?

Hai jamin teri bapauti, 
aur pani bhi hawa bhi,
Cheen le matritv iska, 
aur vish de kar dawa bhi,
Baanjh kar fir is dhara ko
maatu hi kyon bolta hai?

--- Neeraj Dwivedi

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