Sunday, September 7, 2014

जब समझ जाओ, तब तुम मुझको समझाना Jab Samajh Jao, Tab Tum Mujhko Samjhana

तू पिघल रही थी
आँखों से
मोटे मोटे आँसू
ढुलक रहे थे गालों पर
बोझ लिए मन में पहाड़ सा
बैठ रहा था जी पल पल

और दो आँखें देख रहीं थीं
पाषणों की भांति अपलक
पिघल रहा था उनमें भी कुछ
भीतर भीतर
ज्यों असहाय विरत बैठा हो कोई
सब कुछ पीकर

जो बीत रहा वो करे व्यक्त
शब्दों में चाह अधूरी हो
मन सिसक सिसक कर रोता है
जब चुप रहना मज़बूरी हो

हाँ सच है
सच है सबका आना जाना
और सरल बहुत है
औरों को ये समझाना ….

चलो जरा सा, मैं तुमको समझाता हूँ
जब समझ जाओ, तब तुम मुझको समझाना …………

n  नीरज द्विवेदी
n  Neeraj Dwivedi


Thursday, August 28, 2014

तन्हाईयाँ Tanhayiyan

मेरी तन्हाईयाँ
आज पूछती है मुझसे

कि वो भूले बिसरे हुए गमजदा आँसू
जो निकले तो थे
तुम्हारी आँखों की पोरों से
पर जिन्हें कब्र तक नसीब नहीं हुयी
जमीं तक नसीब नहीं हुयी

जो सूख गए अधर में ही
तुम्हारे गालों से लिपट कर
तुम्हारे विषाद के ताप से

वही आसूँ जिन्होंने जिहाद किया था
अपने घरौंदों से निकल कर
स्वयम को बलिदान किया था
तुम्हारे अंतस को, तुम्हारे जेहन को
इत्ता सा ही सही, सुकूँ देने के लिए,

याद है न
गर याद है तो बताओ
तुम्हे सुकून ही चाहिए था न ?
…………………… मिला क्या ??

-    नीरज द्विवेदी

-    Neeraj Dwivedi

Saturday, August 23, 2014

गीत - तरस रहीं दो आँखें Taras Rahin Do Ankhein

तरस रहीं दो आँखें बस इक अपने को

मोह नहीं छूटा जीवन का,
छूट गए सब दर्द पराए,
सुख दुख की इस राहगुजर में,
स्वजनों ने ही स्वप्न जलाए,
अब तो बस कुछ नाम संग हैं, जपने को।
कब से तरस रहीं दो आँखें, अपने को।

जर्जरता जी मनुज देह की,
पर माटी से मोह न टूटा,
अपने छूटे सपने टूटे,
किन्तु गेह का नेह न छूटा,
फिर फिर जीतीं करुण कथाएँ, कहने को।
कब से तरस रहीं दो आँखें, अपने को।

खोटा सूना अंधियारापन,
कब चाहा था आवारापन,
सब कुछ सौपा जिन हाथों में,
उनसे पाया बंजारापन,
चिंतित हैं कुछ रह गए काम, करने को।
कब से तरस रहीं दो आँखें, अपने को

उड़ा एक दिन प्राण पखेरू,
फूट गयी माटी की गागर,
छोड़ छाड़ सब देह धरम,पर
उस माँ ने खोया क्या पाकर,
मोह रह गया बस लावारिस, जलने को।
कब से तरस रहीं दो आँखें, अपने को।

-    Neeraj Dwivedi

-    नीरज द्विवेदी