Thursday, June 6, 2013

ये क्या बेहूदगी है? Ye kya behudagi hai?

ये क्या बेहूदगी है?

तेज हवाएं
धूल भरी आंधी
टूटे फूटे अरमान चीथड़ों से
पता नहीं किसके
जाने कहाँ से लेकर आना
जहाँ मन चाहे फेंक जाना
गडगडाना चिल्लाना
और बरस जाना ...

आज ही तो सूखने को डाले थे
अपने अरमानों के टुकडे
अजन्मी नज्मों के मुखड़े
कुछ टूटे फूटे एहसास
हाँ कुछ जख्म भी
और तुम
आकर फिर नम कर गए ...


ये क्या बेहूदगी है?

Wednesday, June 5, 2013

एहसास Ehsas

चाहे जितनी कोशिश कर लूँ
पूरा होने की

पर मुझे पता है
तुम्हारे बिना अधूरा ही रहूँगा
अतृप्त ही रहूँगा
सूनी आँखों से क्षितिज को निहारता ही रहूँगा ...

देखूँगा स्वयं को
डूबता हुआ
पिघलता हुआ
रोज चारो ओर ...

ढलकता ही रहूँगा आँखों से
एक आस छोड़कर
आँखों में
अगली सुबह के लिए
वो अगली शाम को ढलेगी
लुढ़ककर
धूल को नम कर जाएगी ... शायद तुम्हे भी

फिर भी तुम्हे एहसास नहीं होता?

या होता है?

-- Neeraj Dwivedi

-- https://www.facebook.com/LifeIsJustALife

Monday, June 3, 2013

बोझ आँखों का Bojh Ankhon Ka

क्या देखते हो
आईने में 
लाल आंखें 
गालों पर सूखा पानी 
अपना हाल ....?

अब क्यों ये हाल बना रखा है?
बहा तो दिया 
अभी अभी 
थोड़ी देर पहले
सारा का सारा 
बोझ आँखों से ....

एक दो बूँद हैं 
शायद बच गयीं है
बनी रहने दो 
किसी और दिन काम आयेंगी।

-- Neeraj Dwivedi