Wednesday, July 9, 2014

तुम रूठ जाओगी Tum Ruth Jaogi

हाँ मनाऊँगा,
मनाऊँगा न
तुम्हें तो मनाना भी पड़ेगा
तुमसे निभाना भी पड़ेगा

तुम्हें दुनिया से
हर मुश्किल से
हर दर्द से
हर आह से
हर बुरी नजर से छिपाना भी पड़ेगा

अपने जेहन में
अपनी स्वांसों में
अपनी आँखों में
अपने ख्वाबों में
अपनी रातों में
अपने शब्दों में
अपने गानों में
अपनी नज्मों में
अपनी सिहरन में बसाना भी पड़ेगा

तुम रूठ जाओगी
तो मुझसे मेरा अहम् नहीं रूठ जाएगा
मेरे जीने का वहम नहीं टूट जाएगा
मेरी साँस नहीं रूठ जाएगी?

-- नीरज द्विवेदी

-- Neeraj Dwivedi

Saturday, July 5, 2014

उस एक दिन Us Ek Din

एक दिन मैं चल पड़ूँगा,
दूरियाँ कुछ तय करूँगा।

समय की झुर्री में संचित, उधार का जीवन समेटे,
इस धूल निर्मित देह में ही, चाह की चादर लपेटे,
कुछ जर्जर सुखों की चाह में, यौवन लुटाकर राह में,
नि:शब्द शाश्वत सत्य को, चिरशांति को, मैं भी बढूँगा,
एक दिन मैं चल पड़ूँगा,

चाहे राह मेरी रोकने को, गिर रहा हो आसमां,
या ढूंढ़ कर तारों से लाए, चाँद एक सुन्दर शमां,
अथवा धरा ही कंपकंपी देकर, मुझे धमका सके,
पर मैं अडिग विश्वास ले, चलता रहा, चलता रहूँगा,
एक दिन मैं चल पड़ूँगा,

न तब सुखों की चाह होगी, न ही दुखों की आह किंचित,
अग्निरंजित मृत जरा में, न रह सकेगा भाग्य संचित,
उस शास्त्र वर्णित लोक के, परमेश्वरीय आलोक में,
होकर अकिंचन भी मगर, ऐश्वर्यशाली बन रहूँगा,
एक दिन मैं चल पड़ूँगा,

मैं टूट छोटे से कणों में, लाल लपटों में धुएँ में,
इस सारगर्भित बसुंधरा के, नीर में अरु अश्रुओं में,
और बिखर कर चहुंओर, किंचित भावना के जोर से,
मैं मूर्ति पाकर आँसुओं सी, ओस बन कर गिर पडूँगा,
एक दिन मैं चल पड़ूँगा,

मैं सज सँवर आरूढ़ हो, इस काल के गतिमान रथ पर,
आंशिक गगन को साथ लेकर, बढ़ चलूँगा अग्निपथ पर,
कर मोह के वो पाश खंडित, छोड़ तन ये भाग्य मंडित,
इस लोक से उस लोक तक की, दूरियाँ मैं तय करूँगा,
एक दिन मैं चल पड़ूँगा,
दूरियाँ कुछ तय करूँगा।
n  नीरज द्विवेदी
n  Neeraj Dwivedi

Saturday, June 14, 2014

साँझ और समंदर Sanjh Aur Samandar

धूप से
एक रेशा खींचकर
लपेटना शुरू किया
तो साँझ की शक्ल में
रात आ गयी

उनके साथ
बीते पलों को
समेटना शुरू किया
तो समंदर के पहलू में
बाढ़ आ गयी

तुम्हे पता है
साँझ और समंदर का क्या रिश्ता है
मुझे तो नहीं पता
पर ये जरूर पता है
साँझ आने पर समंदर में उफान जरूर आता है …
उसके भीतर एक तूफान जरूर आता है … 
n  Neeraj Dwivedi