Wednesday, July 15, 2015

तुम्हे नहीं पता होगा Tumhe nahi pata hoga


तुम वही हो न,
जिसकी पलकों के इशारे
बादलों को आकार
और समय को पल पल बदलने के गुर सिखातें हैं

तुम वही हो न
जिसके होंठों के आकार
जब चाहें
मौसम में ख़ुशी और उदासी ले आते हैं

तुम वही हो न
जिसकी आँखों के सम्मोहन से
चाँद तारे और सूरज एक निर्धारित गति से घूमते रहते हैं

तुम वही हो न
जिसके बाल
बदलियों को काला रंग लेने की जिद्द देते हैं

चलो छोडो
तुम्हे नहीं पता होगा
तुमने कभी देखा ही नहीं होगा
ध्यान से, ये चाँद, सूरज, तारे, और बदलियाँ
कभी सुनी ही नहीं होगी
चहलकदमी ख़ुशी या उदासी की

पर मुझे पता है
ये सच है। 

 --   नीरज द्विवेदी

-- Neeraj Dwivedi

Saturday, May 16, 2015

पाषाढ़ पुरूष Pashad Purush



मैं पुरूष
पाषाढ़ कह कर, मुझको ठुकराओ न तुम

आसमां का रंग गुलाबी
यदि तुम्हारे होंठ से है
घुमड़कर घन घन बरसना
पत्थरों की चोट से है
तुम्हारी साँसों से समंदर में कहीं लहरें उठी हैं
अब मुझे
आषाढ़ कह कर मुझसे घबराओ न तुम
मैं पुरूष
पाषाढ़ कह कर मुझको ठुकराओ न तुम

जोड़कर अपने तुम्हारे
स्वप्न कुछ पाले हैं भीतर
साकार करने में गयी है, उम्र
अब छाले हैं भीतर
रौशनी हो तुम तुम्ही से दिन युगों से जग रहे हैं
फिर हमें
रातें समझ कर क्रम को झूंठलाओ न तुम
मैं पुरूष
पाषाढ़ कह कर मुझको ठुकराओ न तुम

मैं रहा हूँ मलिन पोखर
तुम हो गंगाजल सी पावन
मैं ठिठुरता शीत हूँ पर
तुम तो ऋतुओं के हो सावन
तुम सदा हो जिंदगी जल सी सरस मधुरिम सरल हो
तो मुझे
बस पात्र कह कर खुद को बिखराओ न तुम
मैं पुरूष
पाषाढ़ कह कर मुझको ठुकराओ न तुम ................................. नीरज द्विवेदी

Wednesday, May 13, 2015

मैं खता हूँ Main Khata Hun



मैं खता हूँ
रात भर होता रहा हूँ 

इस क्षितिज पर इक सुहागन
बन धरा उतरी जो आँगन
तोड़कर तारों से इस पर
मैं दुआ बोता रहा हूँ
मैं खता हूँ
रात भर होता रहा हूँ 

आँख रोयी या न रोयी
बूँद जो पलकों पे सोयी
मोतियों सा पोर पर रख
जीत कर खोता रहा हूँ
मैं खता हूँ
रात भर होता रहा हूँ

छलक जो आये पलक पर
थरथराते मूक अक्षर
हो गए हैं ब्रह्म देखो
मैं वृथा रोता रहा हूँ
मैं खता हूँ
रात भर होता रहा हूँ

नींद से लड़भिड़ के आये
रूप सतरंगी सजाये
उँगलियों पर रोप सपनें
हर कदम ढोता रहा हूँ
मैं खता हूँ
रात भर होता रहा हूँ ……………………………. नीरज द्विवेदी

Thursday, March 26, 2015

खुशबू सीली गलियों की - सीमा दी


"खुशबू सीली गलियों की" के बारे में लिखने के लिए मुझे बहुत देर हो चुकी है शायद। पता नहीं किसी कविता संग्रह के बारे में लिखने के लायक हूँ मैं या नहीं परन्तु एक संग्रह है जिसके बारे में मैं कुछ लिखना चाहता हूँ। संग्रह का नाम है "खुशबू सीली गलियों की" जिसमें संगृहीत हैं सीमा दी की कवितायेँ।

कविताओं का संग्रह क्या है नव गीत की सुलभ विवेचना, प्रयुक्त छंदों के उद्धरण के साथ जीवन के अनुभूत भावों का मार्मिक प्रस्तुतीकरण है।  इस संग्रह को थोड़ा और सार्थक किया है या यूँ कहें ४ चाँद लगाएँ हैं ओम नीरव जी की प्रस्तावना ने। छंदों के नियम स्पष्ट करते हुए हिंदी विषय के विज्ञ सदय अध्यापक की भांति ओम जी ने इसी संग्रह से विविध उदाहरण प्रस्तुत कर पाठक की उत्सुकता आतुरता को इस हद तक बढ़ा दिया है कि पाठक ऊहापोह में पड़कर सोचने लगता है कि प्रस्तावना पूरी पढ़ी जाये या सीधे ही नवगीतसागर में डुबकी लगाई जाये।

चलिए मैं भी कहानी सुनाना बंद कर इसी संग्रह की कुछ पंक्तियों से संग्रह का परिचय देता हूँ।

तुम मुझे दो शब्द
और मैं
शब्द को गीतों में ढालूँ

जिस प्रकार सागर की पहली लहर ही हमें सागर के सामर्थ्य का एहसास करा जाती है उसी प्रकार इन पंक्तियों में गुंजित प्रवाह हमें सहज ही सीमा दी के नवगीतों की गीतात्मकता का अनुभव कराता है।

इन गीतों के साहित्यिक सौष्ठव बारे में लिखना, इनकी विवेचना करना, मेरे लिए तो संभव नहीं है बस अब दो दो पंक्तियाँ दे रहा हूँ उनके लिए जो अब तक इस संग्रह से अपरिचित है या दूर हैं --

पत्थरों के बीच
इक झरना तलाशें

उफ़!! तुम्हारा मौन कितना बोलता है

तुम चिंतन के
शिखर चढ़ो
हम चिंताओं में उतरेंगे

दिन के कन्धों पर लटके है
वेतालों से सपने
अट्टहास कर रहे दशा पर
वाचालों से सपने

क्यों भला भयभीत है
पिंजरा परों से
साफ़ तो बतलाइए 

तुम्हारे स्वप्न में गुम हूँ
अभी सच में न आ जाना

और भी, हर गीत उद्धरणीय है।
मैं धन्य हूँ कि मैं सीमा दी को जनता हूँ पहचानता हूँ मिला हूँ। अपरिमित शुभकामनाओं के साथ।

-- नीरज द्विवेदी